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अक्षरमुष्टि कथन

इशारों में बात करना

कामसूत्र के अनुसार 'अक्षरमुष्टिका कथन कला' की व्याख्या इस प्रकार है–

अक्षराणां मुष्टिरिव गुप्ति: । गूढ़वस्तु मन्त्रणार्थम् ॥

यह कला भी म्लेच्छित विकल्प अर्थात् गुप्त भाषा ज्ञान से संबंधित है। इस कला का उद्देश्य भी बुद्धि विलास द्वारा मनोविनोद करना है। यह हस्त नेत्र आदि की भंगिमाओं ( संकेतों) से सूचित अर्थ को समझने का कौशल है। यह कला संकेताक्षरों का अर्थ बनाने की कला है। प्रश्न पूछने की एक विधि भी प्रचलित है कि वस्तु को छिपाने के लिए अक्षरों को मुट्ठी में बन्द कर दिया जाता है। और दूसरी विधि है कि मुट्ठी का, अंगुली, अंगुष्ठ के संचालन या त्रिपताका आदि मुद्राएँ बनाकर हाथ के संकेतों से पद क्या है, यह उत्तर माँगा जाता है।

श्रीकृष्ण के जीवन में एक विशेष परोक्ष घटना मिलती है, जिसमें उन्होंने हस्त की भंगिमाओं से पारिभाषिक संकेतों को ज्योतित किया था। यह घटना इस प्रकार वर्णित हैं–

सञ्चिन्त्यारिवधोपायं भीमस्यामोघ दर्शनः । दर्शयामास विटपं पाटयन्निव संज्ञया ॥
तद् विज्ञाय महासत्त्वो भीमः प्रहरतां वरः । गृहीत्वा पादयोः शत्रुं पातयामास भूतले ।।
एकं पादं पदाऽऽक्रम्य दोभ्यामन्यं प्रगृह्य सः । गुदतः पाटयामास शाखामिव महागजः ॥
– ( श्रीमद्भागवत महा पु. 10/72/43–45 )

भीमसेन और जरासंध का युद्ध हो रहा है। श्रीकृष्ण तटस्थ देख रहे हैं। दोनों समान बलशाली हैं। वे नियमानुकूल एक–दूसरे से गदा युद्ध कर रहे हैं। सत्ताइस दिन पूरे हो चुके हैं। श्रीकृष्ण जानते हैं कि जरासंध को हराना भीमसेन के लिए संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने संकेत द्वारा जैसे किसी पेड़ को दो भागों में फाड़कर इधर–उधर फेंक दिया जाता है, वैसा सूक्ष्म संदेश भीम को दिया। भीम ने संकेत को समझा और जरासंध को गिराकर बीच से चीरकर उन दोनों भागों को इधर–उधर फेंक दिया था।