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पानकरस-रागासव योजन

पेय पदार्थ और शर्बत बनाना

कामसूत्र के अनुसार पानकरस–रागासवयोजन कला की व्याख्या इस प्रकार से की गई है–

भक्ष्य– भोज्य, लेह्य–पेयमिति, चतुर्विध आहार: । तेषां निर्माण विधि: ॥

भक्ष्य अर्थात् दाँतों से काटकर खाने योग्य, भोज्य– सामान्यत: भोजन योग्य, लेह्य का अर्थ है– चाटकर खाने योग्य और पेय का तात्पर्य है पीने योग्य जैसे– चने भक्ष्य हैं, हलुआ भोज्य है, चटनी लेह्य है और दूध पेय है। इस प्रकार के भोजन बनाने की कला को पानकरस–रागासव योजन कहते हैं। यह कला वस्तुत: पूर्व कला विचित्रशाकयूषभक्ष्य विकार क्रिया का ही एक अंग है। इस प्रकार इन दोनों को मिलाकर 'पाक कला' पूर्णता को प्राप्त होती है।

इस कला के अन्तर्गत ही रस और आसव बनाने का विधान है। वास्तव में इस कला के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आसव निर्माण की तरफ ही संकेत है। बहुत प्राचीन काल में इसी कला के अन्तर्गत सोम का निर्माण वैदिक काल में होता रहा है। राजाओं के लिए विशेष रूप से कादम्बरी, मैरेय, मधुक और सुरा आदि का निर्माण किया जाता था। वट के वृक्षों से निकाला हुआ रस भी इसी के अन्तर्गत गृहीत होता था।