कामसूत्र के अनुसार 'पट्टिकावेत्रवान विकल्प' कला की व्याख्या इस प्रकार है–
खट्वाया आसनस्य च वेत्रैर्वानविकल्पाः प्रतीतार्थाः ।यह कला बाँस एवं बेत से आसन, आसंदी, वेत्रपट्टिका, करन्डक, पिंजर, यष्टि, नलिकाएँ रसलाका यंत्र आदि रचने का शिल्प है। 'ललित विस्तर' ग्रंथ में इसे 'विदलकर्म' कहा गया है। शिल्पी पुरुष 'विदलकार' कहलाते हैं। इसमें 'मूंज', 'दर्भ' आदि भी इसी कोटि में आते हैं। कुश से प्राचीनकाल में 'चीर' बनते थे, मूंज मेखलाएँ बनाई जाती थीं और वेत्र से बिस्तर या चटाई बनाई जाती थी। बेत से ही यष्टि बनाई जाती थी, जो हाथ में ग्रहण करते थे।
श्रीमद्भागवत पुराण में श्रीकृष्ण ने वेत्र को अत्यन्त प्रिय माना है। श्री वेदव्यास जी ने अनेक स्थानों पर वर्णन किया है कि श्रीकृष्ण अपने बगल में वेत्र रखते थे। यथा–
बिभ्रद् वेणुं जठर पट्योः, शृङ्ग वेत्रे च कक्षे वामे
पाणौ मसृण कवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु ।।.......नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय, गुञ्जावतंसपरि पिच्छल सन्मुखाय ।
वन्यस्रजे कवलवेत्र विषाण वेणु लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशु पाङ्गजाय ।।स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अपने कक्ष में वेत्र को रखते होंगे। वे स्वयं ही अपने लिए बनाया करते होंगे। चूंकि पुराणों में यह भी आया है, कि यमुना के किनारे तब वेत्र के वृक्ष अधिक होते थे, यही नहीं भागवत के दशवें स्कन्ध में जहाँ श्रीकृष्ण की आहिर्निक क्रिया का वर्णन है, वहाँ यह उल्लेख हैं कि वे नित्य प्रात: और संध्या दोनों समय पवित्र आसन पर बैठकर जप और हवन कर्म करते थे। –भाग.10/70
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण इस कला में भी दक्ष थे।

