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आकर्षक्रीड़ा

चुंबक का खेल

कामसूत्र के अनुसान आकर्षक्रीड़ा कला की व्याख्या इस प्रकार है– पाशक क्रीड़ा । अर्थात् पाँसे खेलना।

यद्यपि कोश ग्रंथों में द्यूत और आकर्ष क्रीड़ा दोनों का अर्थ एक ही दिया जाता है, तथापि वात्स्यायन ने उन्हें पृथक कहा है। यशोधर ने 'आकर्ष क्रीड़ा' को द्यूत क्रीड़ा का अंग स्वीकार किया है। प्राचीन काल में 'द्यूत कला' प्राय: पांसों से ही खेली जाती थी, इसलिए ये दोनों कलाएँ द्यूत क्रीड़ा और आकर्षक्रीड़ा एक ही अथवा परस्पर आश्रित कलाएँ थीं। आज भी बहुतायत में ये परस्पर एक–दूसरे की समानार्थी ही हैं।

ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त जुएँ के ऊपर है। पुराणों में भी जुओँ की निंदा की गई है। महाभारत में वर्णित महायुद्ध का मूल कारण यही द्यूत क्रीड़ा थी। रामायण में रावण की नगरी में अक्ष क्रीड़ा और मधुपान के लिये पृथक स्थान थे। महाभारत में श्रीकृष्ण जुएँ को अपनी विभूति मानते हैं। बौद्ध ग्रंथ 'ललितविस्तर' में कहा गया है कि बोधिसत्व को गोपा से विवाह करने के लिये 86 कलाओं के ज्ञान की परीक्षा देनी पड़ी थी, जिनमें अक्षक्रीड़ा भी थी।

इस प्रकार यह अतिप्राचीन कला, जिसमें द्यूत कला और अक्षकला दोनों ही मिली हैं, इसमें भी श्रीकृष्ण अति प्रवीण थे।