कामसूत्र के अनुसार वस्त्रगोपन कला की व्याख्या इस प्रकार है–
वस्त्रेण तद्गूयमानमपि तस्मान्नापैति त्रुटितस्यात्रुटितस्येव परिधानम् ।
महतो वस्त्रस्य संवरणादिनाल्पीकरणम् । इति गोपनम् ॥वस्त्रगोपन वह कला है जिसमें वस्त्रों को इस ढंग से पहना जाता है कि शरीर के अंगों का गोपन हो और वस्त्र की भी त्रुटियाँ छिपाई जा सकें। वेषभूषा करना इसी कला में समाहित है। वास्तव में यह कला कलात्मक रूप से वस्त्रों को पहने की कला है। लोक में इसके प्रमाण अब भी मिलते है, जैसे– साड़ी एक वस्त्र है, इसे बंगाली महिलाएँ अलग ढंग से पहनती हैं और मराठी महिलाएँ अलग ढंग से। यही नहीं, अलग–अलग राज्यों में अलग–अलग तरह से लोग साफा बाँधते हैं, जिसे देखकर पता चल जाता है कि वह किस प्रदेश का है ? श्रीकृष्ण इस कला में अत्यन्त निपुण हैं। वह छोटा–सा फला ( वस्त्रखण्ड–अर्थात् पटका) कई तरह से बाँधते हैं, जो उनके सौन्दर्य को कई गुणा कर देता है।
श्री वेदव्यास ने उसके जो स्वरूप वर्णन किए है, उनमें उस वस्त्रखण्ड ने उनकी शोभा को बहुविध सम्पन्न बनाया है। यथा–
बिभ्रद वेणुं जठरपट्यो: शृङ्गवेत्रे च कक्षे वामे ।
पाणौ मसृण कवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु ॥अर्थात् श्रीकृष्ण ग्वाल–बालों के साथ हँसते हुए भोजन कर रहे थे। उस समय वे अपने उदर और कमर में बँधे फेंटा के बीच में बंशी रखे हुए थे। एक अन्य प्रसंग में ( श्रीमद्भाग. पु. 10/14/01) इसी प्रकार वे उसी वस्त्र–खण्ड को गले में डाल लेते हैं। वह वस्त्र–खण्ड जो अभी कमर में फेंटा जैसा बँधा था, वह गले में फहराने लगता है। लोक पितामह ब्रह्मा जी को वह ऐसा दिखता है, मानो जैसे नील वर्ण के मेघों पर चमकती हुई विद्युत छटा दिखाई देती है। इसीलिए व्यास जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपने आप को वस्त्रों, आभूषणों तथा दिव्य चन्दन मालाओं से सुशोभित करने में परम कुशल हैं। यथा–
आत्मानं भूषयामास नर लोक विभूषणम् ।
वासो भिर्भूषणै: स्वीयैर्दिव्यस्त्रगनुलेपनै ॥अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण इस कला के मर्मज्ञ हैं।

