वैदिक कर्मकांड की दृष्टि से अथर्ववेद को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। स्वयं ऋग्वेद में कहा गया है- 'यज्ञैरथर्वा प्रथम: पथस्तते'। (ऋक् 1/83/5)
ऋग्वेद की यह उक्ति अथर्ववेद की प्राथमिकता के साथ उसकी प्राचीनता की भी परिचायक है। अथर्ववेद के अनेक नाम हैं। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहते हैं। अथर्ववेद की प्राचीन संज्ञा अथर्वांगिरस वेद भी है, इसी को भिषग् वेद भी कहते हैं। अथर्ववेद की नौ शाखाओं का उल्लेख महर्षि पतंजलि ने किया है। चरण ग्रंथ भी अथर्ववेद संहित के नौ भेद मानते हैं- पैप्ल, दान्त, प्रदान्त्य, स्नात, सौल्य, ब्रह्मदाबल, शौनक देवदर्शन और चरणविद्य। इनमें से आज सबसे अधिक शतक संहिता प्राप्त होती है, फिर पिप्पलाद संहिता जो बहुत दुर्लभ हो गई है, मात्र कश्मीरी लिपि में प्रकाशित है। आजकल शौनक संहिता ही पंडितों में प्रचलित है।
शौनक संहिता
इस संहिता में 20 कांड हैं। आचार्य सारण ने इस पर भाष्य किया है। इसमें 759 सूक्त हैं तथा मंत्र संख्या 5987 है। अथर्ववेद के सूत्रों की रचना में एक क्रम व्यवस्था है। इसके 1-1 कांड में जिन सूत्रों का संग्रह हुआ है, उनकी मंत्र संख्या प्राय: एक-सी है जैसे अथर्ववेद के प्रथम कांड के सूक्त प्राय: 4 मंत्रों के हैं। इसी प्रकार द्वितीय कांड के सूक्त 5 मंत्रों के, तीसरे कांड के सूक्त 6 मंत्रों के और चौथे कांड में 7 मंत्रों के सूक्त हैं। पाँच वें कांड में 8 से लेकर 18 मंत्रों तक के, छठे कांड में तीन मंत्रों के और सातवें में कांड में लगभग आधे सूक्त या एक मंत्र वाले हैं। आगे के कांडों में अधिक मंत्रों के सूक्त हैं, परंतु उनमें से आठ में कांड का प्रथम सूक्त सबसे छोटा 21 मंत्रों का है और 19 वें काण्ड का अंतिम सूक सबसे बड़ा 83 मंत्रों का है। यह व्यवस्था अथर्ववेद की एक मुख्य विशेषता है।
अथर्ववेद में विषयों की दृष्टि से हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि अथर्ववेद की 730 सूक्तों में से 144 सूक्त आयुर्वेद संबंधी हैं, राजधर्म संबंधी 215 सूक्त हैं, 75 सूक्त समाज व्यवस्था से संबंधित हैं, 83 सूक्त अध्यात्म विद्या संबंधी हैं तथा शेष 213 सूक्त विभिन्न विषयों से संबंध हैं।
अथर्ववेद के आयुर्वेद संबंधी इन सूक्तों में तलवे से लेकर क्रमश: ऊपर की ओर शरीर के अंगों का वर्णन किया गया है। शरीर रचना के बाद शारीरिक रोगों यथा- ज्वर गंडमाला जैसे साधारण रोगों से लेकर कुष्ठ और राजयक्षमा जैसे भीषण रोगों का वर्णन अथर्ववेद में मिलता है। ज्वर के प्रसंग में शीत ज्वर अर्थात् मलेरिया तथा इकतारा तेजारी आदि भेदों का भी वर्णन है। औषधियों के प्रसंग में अपामार्ग, पृष्णिपर्णी, पिप्पली आदि अनेक औषधियों का वर्णन आया है। जल चिकित्सा का वर्णन भी है, जहाँ उदय होते हुए सूर्य की किरणों का प्रयोग भी बताया गया है। इसी प्रकार आयुर्वेद से संबंधित अनेक बातों का वर्णन मिलता है।
राजधर्म का वर्णन करते हुए अथर्ववेद में शुद्ध प्रजातंत्र राज-व्यवस्था का निर्देश किया है। अथर्ववेद के 2/4/2 मंत्र में स्पष्ट शब्दों में राजा के निर्वाचन का वर्णन है। चतुर्थ कांड के 8 वें सूक्त में अभिषेक का वर्णन है। अभिषेक के समय राष्ट्रपति प्रजाजनों को विश्वास दिलाता है कि मैं राष्ट्रजनों के मध्य में सदैव उनका निज और उत्तम विश्वास भाजन रहूँगा। (3/5/2) राष्ट्रपति से आशा की जाती है कि वह सदैव राष्ट्र की उन्नति के लिए तत्पर रहेगा। राज्य के शासन के लिए ना केवल राष्ट्रपति अपितु उनकी राष्ट्र सभा तथा प्रवर समिति का निर्देश भी (7/13/1) किया गया है जिसमें राष्ट्र की व्यवस्था के लिए राष्ट्रपति और उसकी राष्ट्र सभा के सदस्यों में पूर्ण सहयोग होना आवश्यक है। (7/13/2) राष्ट्र सभा के सदस्य राष्ट्रपति के साथ एक स्वर में बोलें और राष्ट्र के लिए उनके ज्ञान और शक्ति का उपयोग किया जाए, इस राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए उच्चतम सिद्धांतों का प्रजातंत्रात्मक आदर्शों पर अथर्ववेद में प्रतिपादन किया गया है।
यह अथर्ववेद का तीसरा प्रतिपाद्य विषय है। वैदिक संस्कृति में समाज व्यवस्था की आधार भूमि वर्णाश्रम व्यवस्था है, जिस पर अथर्ववेद में बहुत कुछ कहा गया है।
समाजशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार हमारे सामाजिक जीवन की इकाई परिवार है। तीसरे कांड के तीसरे सूक्त में हमारे पारिवारिक जीवन का जो आदर्श चित्र उपस्थित किया है, वह उद्बोधन देने वाला तथा तीनों कालों का सत्य है। वहाँ बताया गया है कि माता-पिता, पुत्र, पति-पत्नी, भाई-बहन परिवार के मुख्य अंग हैं। इनके पारस्परिक संबंधों का प्रदर्शन करते हुए अथर्ववेद कहता है कि पुत्र-पिता का अनुगामी और माता के मन के अनुसार चलने वाला हो, पति और पत्नी दोनों मधुर भाषी बने, भाइ-बहनों में कभी किसी प्रकार का द्वेष या झगड़ा नहीं हो, सब आपस में समान खानपान आदि रखें, सामाजिक जीवन में प्रेम का संचार रहे, सहृदय समान मन वाले बनें, द्वेष न करें। जैसे गाय अपने बछड़े को प्यार करती है, वैसे ही हम एक-दूसरे को प्यार करें। इस प्रकार अथर्ववेद हमारे सामाजिक जीवन को आदर्श बनाना चाहता है।
अथर्ववेद का आदर्श चौथा मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। अस्यवामीय नाम के नौवें काण्ड का नौवाँ सूक्त अध्यात्म विद्या
का सबसे मुख्य सूक्त है। यह सूक्त ऋग्वेद में भी पाया जाता है, इसे हम भारतीय दर्शनशास्त्र का आदि स्रोत कह सकते हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में एकेश्वरवाद और बहुदेववाद अद्वैतवाद आदि कई ऐसे ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनका विवेचन अथर्ववेद में स्पष्ट शब्दों के साथ किया गया है। बहुदेववाद का निराकरण कर एकेश्वरवाद की स्थापना करते हुए अथर्ववेद कहता है कि इंद्र, मित्र, वरुण, यम आदि अलग-अलग देवता नहीं हैं, यह सब गुण भेद से परमात्मा के ही नाम हैं। (9/10/28)। सृष्टि विज्ञान में ईश्वर जीव और प्रकृति यह तीन नित्य पदार्थ अथर्ववेद के पैमाने हैं। इन तीनों के स्वरूप और परस्पर संबंध का निरूपण करते हुए अलंकार रूप में अथर्ववेद में लिखा है कि समान रूप तथा साथ-साथ रहने वाले दो मित्र पक्षी एक समान वृक्ष पर बैठे हैं उनमें से एक उस वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है और दूसरा नहीं। (3/9/20) यह वृक्ष प्रकृति है, दोनों पक्षी ईश्वर और जीव हैं। जीव फलों का भोग करता है, ईश्वर फल भोग से अलग है साक्षी है, अध्यात्मवाद में इस ईश्वर का साक्षात्कार ही जीवात्मा का ध्येय है। अथर्ववेद में इसका निरूपण करते हुए कहा है कि जो इसको नहीं जानता, उसके लिए वे वाद सब व्यर्थ हैं। (9/10/18) परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने पर जीव परम आनंद स्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है। (10/8/44) यही अथर्ववेद का अध्यात्मवाद है।
अथर्ववेद ने स्वयं वेद को माता और देव को काव्य कहा है। काव्य की आत्मा रस है और उसकी सर्वोत्तम आनंद अनुभूति को ब्रह्मानंद सहोदर कहा गया है। अथर्ववेद में उस ब्रह्मानंद की अनुभूति का वर्णन करते हुए लिखा है कि 'रसेन तृसो न कुत्श्चनोन' (10/8/44) साहित्य में आचार्य अभिनव गुप्त की रस संप्रदाय का आदि मूल संभवत: यही रहा है। जब हम (3/25/2) मंत्र पढ़ते हैं तो हमें मध्यकाल के श्रृँगार साहित्य का स्मरण हो जाता है। अथर्ववेद के चतुर्थ काण्ड के 15वें सूक्त में वर्षा का वर्णन है, जहाँ प्रकृति का बड़ा सुंदर और उत्कृष्ट उदाहरण है। साहित्य जगत में वाल्मीकि और तुलसीदास के वर्णन इससे प्रभावित हुए हैं। इसी प्रकार अन्य अनेक प्राकृतिक और साहित्यिक वर्णन अथर्ववेद में आए हैं।
अथर्ववेद से संबंधित कुछ ग्रंथ
अथर्ववेद की 9 शाखाओं में से ब्राह्मण ग्रंथों में केवल गोपथ ब्राह्मण उपलब्ध है। श्रौत सूत्रों में एकमात्र वैतान सूत्र उपलब्ध है। शिक्षा ग्रंथों में मांडूकी शिक्षा ग्रंथ उपलब्ध है। इसी प्रकार अथर्ववेद से संबंधित पाँच कल्पसूत्र और पाँच लक्षण ग्रंथ प्राप्त होते हैं। कल्पसूत्र हैं- नक्षत्र कल्प, वैतान कल्प, संहिता विधि (इसी को कौशिक गृह्य सूत्र कहते हैं), आंगिरस कल्प और शांति कल्प। लक्षण ग्रंथों में शौनकीयाचतुरध्यायिका अथर्ववेद का सबसे प्राचीन प्रातिशाख्य है। तीसरा लक्षण ग्रंथ पंच-पटलिका है। चौथे में दन्त्योष्ठ विधि और पाँचवी में बृहद सर्व अनुक्रमणिका उपलब्ध है। इस प्रकार पंच -पटलिका में अथर्ववेद के कांडों एवं मंत्रों की संख्या का विवरण, उच्चारण विधि तथा अथर्ववेद के ऋषि देवता और छंदों का परिचय प्रस्तुत किया गया है।
अथर्ववेद के उपनिषदों में पिप्पलाद शाखा का प्रश्नोपनिषद उपलब्ध है। शौनक शाखा के दो उपनिषद प्राप्त होते हैं- मुण्डक एवं मांडूक्य।
अथर्ववेद के अंगों में कलाओं के संकेत एवं बीज
रोगों के वर्णन और उनके दूर करने के उपाय (1/2/1-25), रहस्यमयी विद्या, मधु विद्या का वर्णन (1/34), दूसरे कांड में शत्रुओं के नाश का विधान (सूक्त 14,15,16,18,19,20,21,22,23,24), बल प्राप्ति (17)। इसी कांड में एक विशेष पृष्णिपर्णी औषधि के जीवनी शक्ति संबंधी गुणों का वर्णन है। 26 वें सूक्त में पशुओं के सुनियोजन का वर्णन है। यक्षमा रोग से संबंधित अनेक सूक्त हैं। स्वराज्य के संबंध में वैदिक अवधारणा तीसरे कांड में वर्णित है। विशेष रूप से तीसरे सूक्त में इसका वर्णन है। शाला निर्माण कला संबंधी सूक्त भी इस कांड में आए हुए हैं, इसके लिए बारहवाँ सूक्त विशेष रूप से द्रष्टव्य है। चौथे कांड में राष्ट्र देवी सूक्त आया है, जो राष्ट्रीय शक्ति को कैसे समृद्ध बनाएँ, इसका वर्णन करता है। साथ ही इस कांड में सेना के संयोजन और सैन्य व्यूह रचना संबंधी वर्णन भी मिलता है। पाँचवें कांड में विशेष रूप से लाख कला, सर्प विष दूर करने की कला, पुरुषत्व संबंधी कला, शत्रु सेना को अचेत करने की कला, रोगों को फैलाने वाले कीट-पतंगों को नष्ट करने की कला, गर्भाधान कला तथा भूत-प्रेतों को भगाने वाली भूत विद्या का वर्णन आया है।
अथर्ववेद के छठवें कांड में भावनाओं को पुष्ट बनाने संबंधी बातें आई हैं, यहाँ गर्भ में ही बच्चे को शुभ संस्कार देने की कला की चर्चा (सूक्त क्रमांक 11) विशेष द्रष्टव्य है। आँखों के रोग, काम संबंधी बीमारी, ईर्ष्या रोग को दूर करने के उपाय बताए हैं। साथ ही सौंदर्य और केश के लिए औषधि वर्णन है। औषधियों को किस प्रकार अधिक शक्तिशाली बनाया जाए, इसका विधान भी है। गर्भाधान की जटिलताएँ दूर करने के लिए मानसिक चिकित्सा भी है। इसके बाद इसी कांड में सूक्त संख्या 89 से 111 तक मानसिक चिकित्सा संबंधी सूक्त आए हैं। इसके साथ ही इसी कांड में आयुर्वेद संबंधी अनेक सूक्त हैं। सातवें कांड में गंडमाला जैसे रोग की चिकित्सा के लिए (78,80,81) विशेष रूप से मानसिक चिकित्सा के अनेक सूक्तों के बाद औषधियों को संरक्षित रखने के सूक्त अष्टम कांड के सातवें सूक्त में बताए हैं। एक अत्यंत गुप्त मधु विद्या का वर्णन अथर्ववेद के नौवें कांड में है। इसके बाद दसवें कांड में मणियों के विभिन्न गुणों का वर्णन आया है। ओखली और मूसल जैसी सामान्य वस्तुओं को विशेष प्रकार की लकड़ी से बनाने का विधान भी बताया गया है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि अथर्ववेद में मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूरा विचार हुआ है और इसके लिए आवश्यक जो भी विद्याएँ, कलाएँ ऋषियों को उस समय प्रतीत हुई, उनका वर्णन हुआ है। अथर्ववेद के 19 में कांड में आए हुए रात्रि सूक्त, काल सूक्त और अगस्त्य ऋषि का सोलहवाँ सूक्त जिसका देवता बृहस्पति है, जिसमें चेतना से उत्पन्न ज्ञान की किरणों को अवरोधक अज्ञान के पर्वतों को तोड़कर बाहर निकलने की बात है, उन सूक्तों पर अब वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है। वस्तुत: अथर्ववेद कलाओं और विद्याओं के संपूर्ण बीजों को अपने में सुरक्षित रखे हुए हैं, जो उस काल में ऋषियों के मस्तिष्क में उपजे थे, उन्हीं विचारों को आज पल्लवित करने के लिए तकनीक आवश्यक है।

