कामसूत्र कला के अनुसार द्यूत विशेष कला की व्याख्या इस प्रकार है–
निर्जीवद्यूतविधानम् ।
तत्र ये प्राप्त्यादिभिः पंचदर्शंभिरगैर्मुष्टिशुल्कादयो द्यूतविशेषा: प्रतीतार्था: ॥द्यूत को परिभाषित करते हुए मनु ने कहा है– अप्राणिभिर्यत्क्रयते तल्लोकेद्यूतमुच्यते। पांसा, कौड़ी आदि जड़ वस्तु को सशर्त दाँव पर लगाना 'द्यूत' कहलाता था। द्यूत अर्थात् जुआ। भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से यह मनोरंजन के रूप में प्रचलित रहा है। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। ऋग्वेद के समय इस खेल की बुराई भी ज्ञात थी। कहा गया है– 'अक्षैर मादीव्य' अर्थात् पाँसों से मत खेलो। उस समय द्यूतक्रीड़ा का प्रमुख साधन थे पाँसे, जो विभीदक ( बहेरे) वृक्ष की लकड़ी से बनते थे। पाँसों के लिये कत्ता शब्द का प्रयोग होता था। इन्हें लोक में कौड़ी कहा जाता था। महाभारत में द्यूतक्रीड़ा का वर्णन मिलता है। महाभारत युद्ध मूल में द्यूतक्रीड़ा का खेल ही था।
अक्षग्लहः सोभिभवेत् पर नस्तेनैव कालो भवतीदमात्थ ।
दीवयामहे पार्थिव मा विशङ्का कुरूष्व पाणं च चिरं च मा कृथाः ।।इस भयंकर युद्ध में कौरवों का तो नाश हुआ ही, पर पाण्डवों का भी काफी नुकसान हुआ था। द्यूत एक कला है, मनोरंजन का कारण है, पर यह विवाद, अनर्थ, पाप, वैमनस्य तथा छल का मूल भी है।
श्रीकृष्ण इस कला में पूर्ण निपुण थे, उन्होंने स्वयं श्रीमद्भगवद् गीता के विभूतियोग नामक दसवें अध्याय में कहा है कि–
द्यूतं छलयतामस्मि ।अर्थात् मैं छल करने वालों में जुआँ हूँ।
यहाँ स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण द्यूतकला को अपनी विभूति घोषित कर रहे हैं।

