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गीत

गायन

भारतीय संस्कृति के आधार ग्रंथ वेद हैं। वेद के आधार पर यह निर्णय होता है कि गीत की उत्पत्ति सामवेद के प्रणव अर्थात् ऊँकार से (उद्गीथ) हुई है। ऊँकार नादात्मक ब्रह्म है, जो ब्रह्मा के नि:श्वास रूप वेद का मूल है, इसीलिए ऋषियों ने साम स्वरों को नादात्मक ब्रह्म कहा है। वेद में साम तत्त्व को प्रकृतियज्ञ की प्रतिष्ठा माना गया है। सामवेद की शिक्षा के अनुसार- 'गीतिषु समख्या' यानी गीति प्रधान मंत्र को ही साम कहते हैं। सामवेद के उपवेद को इसीलिए गांधर्व वेद कहा गया है। वेद के अनुसार साम का प्रथम उदय हिंकार से हुआ है, इसी को प्रणव साम कहा गया है। इसीलिए आगे नाद, स्वर, श्रुति आदि के भेद से संगीत के अनेक पर्व हुए हैं, उनमें नाद ही संगीत की आधार भित्ति है। नाद के आधार पर श्रुति का उत्थान होता है। श्रुति के द्वारा स्वर का आविर्भाव होता है। स्वर आगे जाकर अपने आपको अनेक विधाओं में व्यक्त करता है। मन के अनुगत जो प्राण है, वह गंधर्व प्राण कहलाता है। मन का अधिष्ठाता चन्द्रमा कहलाता है। पार्थिव प्राण को वेद की भाषा में भूतागड़ी कहते हैं, उसी को अप्सरा प्राण कहा जाता है। वैदिक ज्ञान कहता है कि हृदय से लगी हुई जो प्रमुख नाड़ी है, वह 'सुषुम्ना' है।

सुषुम्ना से लगी बाइस तिरछी प्रमुख नाड़ियाँ हैं, इन बाइस नाड़ियों के भेद में नाद ध्वनियाँ मंद, मध्य और तार क्रमश: बाइस गुणा तीन अर्थात् 66 श्रुतियाँ बन जाती हैं। श्रुति का भाव वायव्य हो जाता है, जबकि स्वर का भाव आदित्य अर्थात् सौर्य रहता है, इसलिए संगीत का प्राण वैदिक दृष्टि से स्वर है, स्वर सौर्य तत्त्व है, स्वर्गीय है, दिव्य तत्त्व है, इसी के आधार पर गीत का भवन खड़ा है। श्रीमद् भागवत के व्याख्याकार श्रीधर के अनुसार-

स्वरंग पदगं चैव तथा लयमेव च। चेतोव धानगं चैव गेयं ज्ञेय चतुर्विधम्॥

अर्थात् गीत चार प्रकार का होता है- स्वर, पद, शब्द, लय/ चित्त का अवधान इसके केन्द्र में होता है। यह कला भारत की प्राचीन कलाओं में सबसे प्रथम गिनी जाती है। आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में इसको कलाओं में प्रथम स्थान दिया है- 'गीते प्रयत्न: प्रथमं काय:बर्य:।' अर्थात् गीत चित्त को प्रसन्न करने वाली स्वर लहरी कही जाती है। यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में प्रारम्भ में ही कहा गया है कि गीत गायन के लिए 'गीताय शैलुषम' अर्थात् यज्ञ में गायक रखने का विधान था। भगवान श्रीकृष्ण इस कला में निपुण थे। यही नहीं, उनकी सखियाँ और गोपियाँ संगीत शास्त्र की मर्मज्ञ पंडिता थी। श्रीकृष्ण जब गाते तो उनके स्वर से स्वर मिलाती हुई गोपियाँ गान करती थीं।

काचित् समं मुकुन्देन स्वर जातीरमिश्रिताः। उन्निन्ये पूजिता तेन प्रीयता साधु साधिवति। तदेव धुव मुन्निन्ये तस्यै मानंच बह्वदात्।।
- (श्रीमद् भाग./10/33/10)

अर्थात्- जब श्रीकृष्ण गान कर रहे थे तो कोई गोपी भगवान के साथ स्वर की गतियाँ न मिलाते हुए उसी क्षण ध्रुव ताल से अपने स्वर को ऊँचा ले गई, इस बात से श्रीकृष्ण ने अति प्रसन्न हो 'वाह! वाह!' कहकर आदर पूर्वक उस गोपी को बहुत मान दिया।

भगवान श्रीकृष्ण की वेणु के द्वारा गाया गया जो गीत है, वह अद्भुत है। व्यास जी ने उसे स्वयं वेणु गीत कहा है, वह वेणु वादन नहीं है, वह वेणुगीत है। ऐसा गीत जो भारतीय साहित्य में अद्वितीय है। जिसको सुन कर मोर नाचने लगते हैं, हिरिणियाँ अपने को धन्य मान लेती हैं, देवांगनायें मोहित हो जाती हैं, गायें और बछड़े आनन्द में डूब जाते हैं, आनन्द के आँसू आँखों से बहने लगते हैं, पेड़ पर फल खाते हुए पक्षी आनन्द से आँखें बन्द कर लेते हैं, नदियाँ आनन्द से लहरा उठती हैं, भीलनियों का मन काम द्वारा आन्दोलित हो जाता है। समस्त जड़-चेतन, की तरह और चेतन जड़ की तरह व्यवहार करने लगते हैं। ऐसा है श्रीकृष्ण का वेणुगीत। -(श्रीमद्भागवत 10/20)

संभवत: इसी वर्णन को देखकर किसी शास्त्र कलाकार को गीत के ही दो भेद करने पड़े- गात्रज्य और मुखजं यथा-

तथाहि गीतं च द्विविधं प्रोक्तं यंत्रगात्र विभागतः। यन्त्रं स्याद्वेणु वीणादि गात्रं तु मुखजं मतम्॥

इस वेणु गीत के गायक का चित्र भी भागवत का मनोहरतम श्रीकृष्ण का स्वरूप वर्णन माना जाता है। इसकी झाँकी इस प्रकार व्यास जी ने प्रस्तुत की है-

बर्हा पीडं नटवरवपु: कर्णयो: कर्णिकारं बिभ्रद्वास: कनक कपिशं बैजन्तीं च मालाम्॥ रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोप वृन्दै वृन्दारण्यं स्वपद रमणं प्राविशद् गीत कीर्ति: ॥
-श्रीमद् भागवत, 10/21/5

अर्थात् श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख का मुकुट शोभित है। कानों में अमलतास के फूलों के गुच्छे लटक रहे हैं। शरीर पर सोने के वर्ण का पीताम्बर धारण किए हैं। कण्ठ में वैजयन्ती की माला झूल रही है। कुछ तिरछे से चलते हुए नटवर अपने शरीर की मुद्रा बनाये हुए हैं। उनकी अगुलियाँ उस मुरली पर जो उनके होंठों पर रखी हुई है, उनके छिद्रों पर नाच रही है। ऐसे श्रीकृष्ण गौ और गोपों से घिरे वृंदावन में पधारे हैं, जिनकी कीर्ति फैली हुई है।