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हस्तलाघव

हाथ की सफाई

कामसूत्र में हस्तलाघव कला की व्याख्या इस प्रकार से की गई है–

सर्व कर्मसु लघुहस्तता कालातिपात निरासार्थम । द्रव्य हानिषु वा लाघवं क्रीड़ार्थ विस्मापनार्थम् च ॥

सब कार्यों को अत्यन्त तीव्रता से जिसमें समय अत्यधिक कम लगे और ऐसे करना कि देखकर लोग चकित हो जाये 'हस्त लाघव' कहलाता हैं। इसमें विशेष दो गुण होते हैं, पहला– कार्य अतिशीघ्रता से करना; दूसरा– इतनी शीघ्रता से करना कि लोगों को वह चमत्कारपूर्ण प्रतीत हो।

हस्तलाघव का उदाहरण श्रीमद् भागवत के दशवें स्कन्द के अन्तर्गत चबालीसवें अध्याय में कंस वध के प्रसंग में द्रष्टव्य है। श्रीकृष्ण ने कंस के यज्ञ में कुवल्या पीठ हाथी को मार डाला और कंस के द्वारा बुलाये गये मल्लों को मल्लयुद्ध में पराजित कर उन्हें समाप्त कर दिया। यह देखकर कंस जोर–जोर से चिल्लाकर कहता है कि दुराचारी वसुदेव के पुत्र कृष्ण और बलराम को नगर से बाहर निकालो, इनके पिता दुर्बुद्धि वसुदेव को शीघ्र मार डालो और मेरे पिता उग्रसेन को उनके सेवकों सहित तुरन्त मार डालो, क्योंकि वे शत्रु के पक्ष में है।

एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोऽवययः । लघिम्नोत्पत्य तरसा मञ्च मुत्तुङ्गमारुहत् ॥34 ॥
तमाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन आसनात् । मनस्वी सहसोत्थाय जगृहे सोऽसि चर्मणी ॥35 ॥
तं खड्गपाणिं विचरन्तमाशु श्येनं यथा दक्षिण सव्यमम्बरे । समग्रहीद दुर्विषहोग्रतेजा यथोरंग ताक्ष्र्यसुतः प्रसह्य ।॥36 ॥
प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीटं निपात्य रङ्गोपरि तुङ्गमञ्चात् ॥37 ॥ तं सम्परेतं विचकर्ष भूमौ, हरिर्यथेभं जगतो विपश्यत: ।
हाहेति शब्द: सुमहांस्तदाभू दुदीरित: सर्वजनैर्नरेन्द्र ॥38 ॥
– ( श्रीमद्.भा./10/44/38 )

कंस के इस प्रलाप को सुनकर श्रीकृष्ण तत्काल अत्यन्त स्फूर्ति से उस ऊँचे मंच पर झपटकर चढ़ जाते हैं। कंस अपनी मृत्यु को आते हुए देखकर ढाल और तलवार लेकर उठ बैठता है, पर उसके सावधान होने के पूर्व ही श्रीकृष्ण अपने असह्य तेज से उसे झपट कर वैसे ही पकड़ लेते हैं, जैसे शक्तिशाली गरुड़ सर्प को पकड़ लेता है।

वे उसकी चोटी के केशों को पकड़कर उसके मुकुट को ठोकर मारते हैं और उस भोजपति कंस को उसी ऊँचे मंच से नीचे उठाकर फेंक देते हैं और फिर तत्काल वहीं से कंस के ऊपर कूद जाते हैं। कंस प्राण त्याग देता है, पर श्रीकृष्ण उस मरे हुए राजा कंस को कुछ दूर तक वैसे ही घसीटते हैं, जैसे सिंह किसी मरे हुए प्राणी को घसीटता है। प्रेक्षक देखते हैं कि एक ही क्षण में कंस आक्रोश में चिल्लाता है और उसी क्षण में कृष्ण उस पर आक्रमण करते हैं और एक ही क्षण में वह मंच से गिरकर प्राण त्याग देता है। यह आश्चर्यजनक कार्य देखकर उनके प्रेक्षकों के मुख से हाहाकार शब्द निकल पड़ता है।

इस चित्र में व्यास जी ने अपनी तूलिका से श्रीकृष्ण के हस्तलाघव कला में निपुणता को उकेरा है।