कामसूत्र के अनुसार भूषण योजन कला की व्याख्या इस प्रकार है–
अलंकार योग: । स द्विविध: संयोज्योऽसंयोज्यश्च ।
तत्र संयोज्यस्य कष्टि केन्द्रच्छन्दादेर्मणिमुक्ता प्रवालादिभि: योजनम् ॥
असंयोज्यस्य कटककुण्डला देर्विरचनं योजनम् ।
तदुभयं नेपथ्यांगम् । न तु शरीरे भूषणयोजनम् ॥
तस्य नेपथ्यप्रयोगा इत्यनेनैव सिद्धत्वात् ॥यह कला दो प्रकार का होता है एक है– संयोजन वाली, इसमें काठी के बीच में मणि, मोती, मूँगा आदि लगाये जाते हैं। दूसरी है– असंयोजन वाली, इसमें सीधे ही शरीर पर आभूषण धारण करते हैं, जैसे– कुण्डल, कड़ा, हार आदि। इस प्रकार यह कला वास्तव में नेपथ्य कला का ही एक अंग है। श्रीकृष्ण प्राकृतिक वातावरण में रहते थे, इसलिए वे इस प्रकार के रत्नों आदि के अलंकारों का प्रयोग प्राय: नहीं करते थे। वे विविध प्रकार के पुष्पों जैसे– कमल, पदम्, कर्णिकार और नीप आदि पुष्प, तुलसी, दूर्वा के अंकुरों और पत्रों का आभूषण रूप में विनियोग करते थे। वे सिर पर मुकुट के स्थान पर मयूर पिच्छ का प्रयोग करते थे, इसके अनेक उदाहरण श्रीमद् भागवत पुराण में आये हैं।
बर्हापीडं नटवर वपु: कर्णयो: कर्णिकारं।
विभ्रद्वास: कनक कपिशं वैजयन्ती च मालाम् ॥इस वेणु गीत में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि श्रीकृष्ण को भूषण योजन कला में अत्यन्त निपुणता है। वे सिर पर मयूर पिच्छ धारण किए हुए हैं, कानों में कुण्डलों के स्थान पर कर्णिकार की मंजरियाँ धारण किए हैं, स्वर्णिम पीताम्बर बायें शरीर पर अलंकृत हो रहा है और हदय भाग पर वैजयन्ती माला झूल रही है, जिसमें तुलसी कुन्द, पारिजात, नीलकमल के सुमन तथा बीच में कदम का पुष्प सुमेरू के रूप में झूल रहा है। इस प्रकार का भूषण योजन श्रीकृष्ण ने अपने कलेवर पर धारण किया है।

