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कौचुमार

छद्म वेश या रूप बदलना

कामसूत्र के अनुसार कौचुमार कला की व्याख्या इस प्रकार है–

कौचुमार स्यैते सुभंगकरणादय:, उपायान्तरासिद्ध साधनार्था: ।

कौचुमार प्रयोग का अर्थ है– सौन्दर्य वृद्धि के लिए शरीर पर किए हुए प्रयोग, जैसे– उबटन, चन्दन, लेपन से अपने शरीर को अलंकृत किया जाना। इसी प्रकार स्त्रियाँ अपने शरीर को अलंकृत करने के लिए पैरों में लाक्षारस लगाती हैं, ओठों को रंगती हैं, शरीर की पुष्पों के पराग से सौन्दर्य वृद्धि करती हैं। श्रीकृष्ण के जीवन में इस कला का अत्यन्त महत्त्व है। वे गोधन के चरणों की रेणु से अपने को अलंकृत करते हैं तथा चन्दन के लेपन से अपने सुन्दर शरीर को और भी सुन्दर बनाते हैं। वे इस कला का उपयोग करने में अति निपुण हैं। श्रीकृष्ण अपने मामा कंस के यज्ञ में भाग लेने के लिए अक्रूर के साथ मथुरा आये। वे राजधानी मथुरा नगरी में यज्ञ सम्पन्न हो रहा था, उस अत्यन्त सुन्दर नगरी का अपने भाई बलराम के सहित अवलोकन के लिए निकले। उन्हें यज्ञ में पहुँचना था और वे भोजपति महाराज कंस के भान्जे हैं तो उन्हें अलंकृत तो होना ही चाहिए। वे देखते हैं कि सामने एक तरुणी जो शरीर से कुब्जा है और उसके हाथ में एक अंगराग से भरा हुआ कटोरा है। वे उससे हँसकर पूछते हैं कि हे सुन्दरी ! तू हम दोनों को यह अंगराग अर्पित करो, तुम्हारा मंगल होगा।' महर्षि व्यास के शब्दों में–

विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां । पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रद: । का त्वं वरोर्वेतदु हानु लेपनं । कस्याङ्गने वा कथयस्व साधु न: । देह्यावयोरङ्ग विलेपमुत्तमं । श्रेयस्ततस्ते नचिराद् भविष्यति ॥ 2 ॥
–( श्रीमद्भागवत, 10/42/2 )

इस बात पर वह कुब्जा सुन्दरी अत्यन्त प्रसन्न हुई। कारण यह था कि उसने अभी तक अपना अपमान ही सहा था। लोगों ने उसे कुब्जा ही कहा था, पर अब सामने खड़े कामदेव के साक्षात् स्वरूप श्याम सुन्दर ने जब उसे सुन्दरी कहकर संबोधित किया तो उसका अन्तरमन खिल उठा। उसे अपने सौन्दर्य का बोध हुआ। तो वह कहने लगी कि–

रूपपेशल मा धुर्यहसितालापवीक्षितै: । धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयोरनुलेपनम् ॥ ततस्तावङ्ग रागेण स्ववर्णेतर शोभिना । सम्प्राप्तपर भागेन शुशुभातेऽनुरञ्जितौ ॥
–( श्रीमद्भागवत–10/42/4 5 )

कुब्जा ने श्रीकृष्ण की सुन्दरता, सुकुमारता, मधुरता, हास्य और बोलने की कला तथा उनके अवलोकन से मोहित होकर उन दोनों ( श्रीकृष्ण और बलराम) को वह अंगराग अर्पण किया। श्रीकृष्ण ने पीत वर्ण के उस अंगराग को सब शरीर पर लगाया, इससे उनका सौन्दर्य और भी उत्कर्ष को प्राप्त हो गया। इस प्रकार इस कला के प्रति श्रीकृष्ण की अंगराग की स्पृहा और निपुणता दोनों का पूर्ण परिचायक है।