मध्यप्रदेश शासनश्रीकृष्ण पाथेय न्यासश्रीकृष्ण पाथेय न्याससंस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन
साइन इन
← 64 कलाएँ

काव्यसमस्यापूरण

अधूरी कविता को पूरा करना

कामसूत्र के अनुसार काव्यसमस्यापूरण कला की व्याख्या इस प्रकार है–

काव्यस्य श्लोकस्य समस्या पादस्य पूरणम् । क्रीड़ार्थं वादार्थं च ।

अर्थात् काव्य या छन्द के चरण पूरे करना। यह क्रीड़ा या वाद–विवाद के प्रयोजन से हो सकता है।

प्रसिद्ध कथन है– 'काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।' इस कला का अभ्यास मनोविनोद के लिए होता है। कवियों के काव्य कौशल की परीक्षा के लिये एवं नये कवियों को काव्य रचना का अभ्यास कराने हेतु यह किया जाता है। प्राचीन काल में यह विद्वानों के मनोविनोद की प्रमुख कला थी।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में रासपञ्चाध्यायी प्रकरण के अंतर्गत आता है कि जब श्रीकृष्ण की बंशी की धुन सुनकर बृज से गोपियाँ आकर्षित होकर रात के समय जमुना के तीर पर आ गयी थीं, तब उन्होंने हँसते हुए श्लेष अलंकार से युक्त शब्दों में कहा था–

दृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररञ्जितम् । यमुनानिललीलैजत्तरूपल्लवशोभितम् ॥
– ( श्रीमद्भागवत, 10/29/21 )

– तुमने फूलों से खिले हुए वन को देख ही लिया है जो पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों से अनुरंजित है और जो यमुना के पवन के लीलाविलास से कम्पित वृक्षों के पल्लवों से शोभित है।

तद्यातमा चिरं गोष्ठं शुश्रषध्वं पतीन् सतीः । क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत ।।
–श्रीमद्भागवत ( 10/29/22 )

अत: हे पतिव्रताओ ! तत्काल अपने घरों को चली जाओ। अपने पतियों की सेवा करो। गौओं के बछड़े और तुम्हारे बालक रो रहे हैं। उन्हें दूध पिलाओ और गौओं को दुहाओ।

भगवान के वचन तो मीठी भाषा में थे, पर उन्होंने गोपियों के सामने जो उनका लक्ष्य था, उसमें बाधा डालकर उन्हें निराश कर दिया। वे तो श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम में बँधी रमण के लिये आयी थीं, परंतु उनके प्रेमी श्रीकृष्ण ही उल्टे उन्हें घर जाने के लिये कह रहे हैं, इसलिये गोपियों का मुख सूख गया। वे व्याकुल हो गई। वे श्रीकृष्ण में पूर्ण अनुरक्त थीं। उन्होंने भरे गले से बोलना प्रांरभ किया– आप कहते हैं कि हमारा स्वागत है और ऐसे क्रूर वचन बोल रहे हैं। हे कृष्ण !

आप कहते हैं कि तुम्हारा क्या प्रिय करें? फिर आप ही कहते हैं कि घर जाओ। हमारे तो एक ही प्रिय वस्तु है और यह प्रिय वस्तु हैं आप ! आपके चरणों के लिये ही हमने सब विषयों को छोड़ दिया है।

कभी आप कहते हैं कि जो आपको प्रेम करता है, ऐसे प्रिय को आप कभी छोड़ते नहीं। फिर आप क्यों कहते हैं कि हम घर लौट जायें। आप कहते हैं कि अपने पति की सेवा करो, अपने बालकों और गाय के बछड़ों की सेवा करें, ऐसा कहने की क्या आवश्यकता है, क्योंकि आप ही समस्त देहधारियों की आत्मा हैं।

अब हम आत्मा स्वरूप आपको छोड़कर संसारी विषयों में अनुरक्त कैसे हो सकते हैं? हे श्रीकृष्ण ! आप को प्राप्त करके अब हम भवसागर में पुन: प्रवेश नहीं करेंगे। हम तो आपकी दासी हैं।

भगवान ने यहाँ एक प्रकार से उन गोपिओं के सामने, जो साक्षात् श्रुतियों का स्वरूप थीं, एक कठिन काव्य समस्या प्रस्तुत की थी, पर वे गोपियाँ साधारण नारियाँ नहीं थी, उन्हें श्रीकृष्ण से प्रेम था, साथ ही उन्हें तत्त्वबोध था। उन्होंने इसी रासपञ्चाध्यायी में ( प्रथम अध्याय में 31 से 41 वें श्लोक तक) इसी समस्या की पूर्ति का सफल प्रयत्न किया। जिसका परिणाम हुआ कि योगेश्वर श्रीकृष्ण निरूत्तर हो गये और उन्होंने गोपियों द्वारा अभीप्रसितरमण प्रारंभ किया। यह श्रीमद्भागवत में एक अद्भुत समस्या की पूर्ति का अद्भुत उदाहरण है।

इस प्रकार यह स्पष्ट है श्रीकृष्ण इस कला में भी अद्वितीय निपुणता संपन्न थे।