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दुर्वाचक योग

कठिन शब्दों के अर्थ समझना

कामसूत्र के अनुसार दुर्वाचक योग कला की व्याख्या इस प्रकार से है –

शब्दतोऽर्थतश्च दु:खेनोच्यत इति दुर्वाचकम् । अर्थात् दुर्वाच्य श्लोकों की रचना दुर्वाचक योग कहलाता है।

चित्रकाव्य का कथन और अर्थबोध दोनों कठिन होते हैं। इसके अंतर्गत अक्षर चितक छंद ( जिस छंद का एक अक्षर निकाल देने से दूसरा अर्थ निकले) इसी प्रकार मात्रा चितक छंद ( जिसकी एक मात्रा बदलने से दूसरा अर्थ निकले) एवं बिन्दुमति छंद ( जिस रचना में अक्षरों के स्थान में केवल बिन्दु रख देने से एक आकृति बन जाये), तथा इसी प्रकार के गूढ़ चतुर्थपाद ( जिसमें केवल तीन चरण हों और चौथे चरण के अक्षर प्रथम तीन पंक्तियों में छिपे हो) ऐसे श्लोकों की रचना को दुर्वाचक योग कहते हैं। श्रीकृष्ण को जब गोपियों ने प्रार्थना करते हुए भी खूब खरी–खोटी रोते हुए सुनाई तो वह सब खरी–खोटी दुर्वाचक योग ही कही जा सकती हैं। जैसे 'रासपञ्चाध्यायी' के तीसरे अध्याय का प्रथम गीत 'मुरजबन्ध' है, तीसरे अध्याय का दूसरा श्लोक 'पद्मबन्ध' है, तीसरा श्लोक 'मुरजबन्ध' है, चौथा पद 'मृदंगबन्ध', पाँचवाँ पद 'पद्मबन्ध' तथा छटवाँ श्लोक 'नागबन्ध' है। इस प्रकार से यह अध्याय पूर्ण रूप से चित्रकाव्य अभिव्यक्त करता है। फलस्वरूप श्रीकृष्ण गोपियों के सम्मुख जब पुन: प्रकट हुए तो उन्होंने गोपियों के प्रति जो वचन बोले, वे भी चित्रबन्ध के उदाहरण हैं। यथा–

मिथोभजन्ति ये सख्य: स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते । न तत्र सौहृदं धर्म: स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा ॥
भजन्त्यभजतो ये वै करूणा: पितरो यथा । धर्मो निरपवादोऽत्र सौहृदं च सुमध्यमा: ॥
भजतोऽपि न वै केचिद्ं भजन्त्यभजत: कुत: । आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरूद्रुहः ॥
–( श्रीमद्भागवत/10/32/17–18–19 )

ये तीनों श्लोक नागबन्ध के उदाहरण हैं।

अत: स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण दुर्वाचक योग कला में विदग्ध थे। ऐसे अन्य उदाहरण भी श्रीमद्भागवत् में प्राप्त होते हैं।