मध्यप्रदेश शासनश्रीकृष्ण पाथेय न्यासश्रीकृष्ण पाथेय न्याससंस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन
साइन इन
← 64 कलाएँ

शुक-सारिका प्रलापन

तोता-मैना को बोलना सिखाना

कामसूत्र के अनुसार शुक–सारिका प्रलापन कला की व्याख्या इस प्रकार है–

शुकसारिका हि मानुषभाषया प्रलापिताः सुभाषितम् पठन्ति संदेशं च कथयन्ति ॥

शुक–सारिका प्रलापन का अर्थ है– तोता–मैना आदि पक्षियों को सीखने की कला। प्राचीन काल में आश्रमों, गुरुकुलों, राजमहलों तथा धनी–मानी व्यक्तियों के यहाँ शुक–सारिका आदि पक्षी मनोरंजननार्थ पाले जाते थे। वहीं वैदिक काल में भी ऋषियों के आश्रमों में पशु–पक्षी स्वाभाविक बैर छोड़कर वास करते थे। श्रीमद्भागवत में परीक्षत से कहने वाले शुकदेव जी के जन्म की कथा भी कैलाशाश्रम में पक्षी प्रेम के होने की गाथा है। अमरनाथ की कथा की अनुश्रुति भी यही बात कहती है। श्रीमद्भागवत में तो स्वयं श्रीकृष्ण ने आश्रमवासी पक्षियों को मुनियों की संज्ञा दी है और कोकिल की वाणी को सूक्तों के समतुल्य बताया है। यथा–

नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्च मुदा हरिण्यः कुर्वन्ति गोप्य इवते प्रिय मीक्षणेन । सूक्तैश्च कोकिलगणा गृह मागताय धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः ॥7 ॥ नद्यौऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकैर्गोप्यो उन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः ॥ 8 ॥
– ( श्रीमद्भागवत पुराण 10/15/7,8 )

अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण शुक–सारिका सहित सभी पक्षियों के मनोभावों को समझ सकते थे तथा उन्हें अपनी बात समझा सकते थे।