कामसूत्र के अनुसार मणिरागाकर ज्ञान कला की व्याख्या इस प्रकार है–
स्फटिकमणीनां रंजनविज्ञानमर्थार्थं भूषणार्थं च ।
पद्मरागादिमणीनामुत्पत्तिस्थान ज्ञानपथार्थम् ।।मणियों को रंगना एवं उनके उद्गम स्थान का ज्ञान 'मणिरागाकर ज्ञान कला' कही जाती है।
मणि को रंगने की प्रक्रिया वास्तव में विज्ञान है, किन्तु मणियों की रंग संयोजना एक कला है। मणियों की कांति दीर्घकालीन होती है और अंधकार में भी उनका प्रकाश विकीर्ण होता है। प्रवाल, पद्मराग, वैदूर्य, इंद्रनील, मरकत, स्फटिक, चंद्रकांत, सूर्यकांत, वज्र आदि मणियाँ हैं। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध उत्तरार्द्ध के 58वें अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा द्वारिका नगरी का निर्माण कराया गया, यह वर्णित है। इसी प्रकार ब्रह्मवैर्वत पुराण श्रीकृष्ण जन्मखण्ड उत्तरार्द्ध के 103वें अध्याय में यही वर्णन लगभग दोहराया गया है, वहाँ स्पष्ट रूप से मणियों के रंग की संयोजन कला पर ध्यान केन्द्रित किया गया है जो इंगित करता है कि श्रीकृष्ण को मणियों के रंगसंयोजन का परिपूर्ण ज्ञान था। वहाँ यह भी स्पष्ट कहा गया है कि मणियाँ हिमालय से लायी जायें और यह काम यक्षों के समूह करेंगे–
मणिनांहरणं चैव यक्षसंधाहिमालयात् ।सिद्ध है कि श्रीकृष्ण मणियों के रंगसंयोजन और उनके आकर ( खदानों) के विषय में पूर्ण निपुण थे।

