वैदिक काल में देवताओं की प्रसन्नता के लिए वेणु बजाई जाती थी और कभी वीणा झंकृत होती थी। युद्ध के लिए कभी दुन्दुभि वाद्य का घोष अन्तरिक्ष को पूरित करता था, तो कभी तूर्यनाद गूँजता था। यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में वीणा भड़ुक, सदसर, तूर्य दुन्दुभि आदि वाद्यों का वर्णन है। नाट्य शास्त्र में चार प्रकार के वाद्यों का वर्णन है- विततं (तन्त्रीगत), अवनद्ध (न्यर्मवद्ध), सुषिर (रन्ध्र युक्त) और घन (परस्पर आघात से बजने वाले वाद्य)। वहाँ कहा गया है कि-
विततम् तन्त्री कृतं ज्ञेयम् अवनद्ध पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेय: सुषिरो वंश उच्यते।।तैत्तिरीय संहिता (3/9/18) में भी इन चार प्रकार के वाद्यों का वर्णन मिलता है।
भरत मुनि अवनद्ध वाद्यों के सौ भेद बताते हैं। श्रीकृष्ण के समय वेद शिक्षा की संस्थाएँ नट् सूत्रों को नाट्य के विषय बताते हुए उन्हें पढ़ा रही थीं। श्रीकृष्ण ने भी सांदीपनि ऋषि के आश्रम में अवश्य इन सूत्रों का अध्ययन किया होगा, इसलिए वे नटवर कहे गये हैं। श्रीमद्भागवद पुराण में कहा गया है-
विविध गोपचरणेषु विदग्धो वेणुवाद्य उरुद्या निज शिक्षाः।
तब पुत्र: सति यदाधर बिम्बे दन्तवेणुरनयत स्वर जाती: ॥।14 ॥सवनशस्त दुपद्यार्य सुरेशाः शूक्रशर्वं परमेष्ठिपुरोगाः।
कवय आनतकन्धरचित्ताः कश्मलं ययुरनिश्चित तत्त्वाः ॥।15 ॥प्रसंग है कि गोपियाँ चौंसठ कलाओं में निपुण श्रीकृष्ण की वेणु-वादन कला की प्रशंसा करते हुए भीतर से प्रसन्न और बाहर से क्रोध करते हुए यशोदा से शिकायत करती हुई कह रही हैं कि- 'हे यशोदा! ये आपके लाड़ले पुत्र जी, ग्वालों की सब क्रीड़ाओं में चतुर हैं। ये तुम्हारे पुत्र कान्हा, जब अपने बिम्बा फल जैसे लाल ओंठों पर वंशी रखकर अपनी ही नई नवीन स्वरों की जातियों को प्रकट करते हैं, तब इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, यम, कालाग्नि, स्कंद, गणेश, सनक, सनत कुमार, नारद आदि जो गान ताल के जानने वाले हैं, वे सब देवता उस गान का शब्द, मंद्र, मध्य, तार, भेद से जिस दिशा से वह आ रहा है, उसी दिशा में अपनी गर्दन और चित्त को झुकाकर सुनते हैं, यद्यपि वे स्वयं विद्वान हैं, नाद के ज्ञाता हैं, तो भी वे तुम्हारे पुत्र के उस गान से मोहित हो जाते हैं और भेद नहीं जान पाते। ऐसा उपद्रव तुम्हारा बेटा कर रहा हैं। यह चित्र जो व्यास जी ने प्रस्तुत किया है, यह वह एकमात्र चित्र श्रीकृष्ण को 'श्री कला गुरु' की उपाधि प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।

