उत्पलमालादि: । अर्थात् शब्द कोष का ज्ञान।किसी भी भाषा के, लोक या साहित्य में प्रचलित ज्ञात–अज्ञात शब्दों, नामों या पदों की अक्षय निधि के संग्रह को अभिधानकोष कहते हैं। अभिधानकोष की अधिकाधिक जानकारी, नागरिक की साहित्यिक रुचि को परिष्कृत करती है। शब्दों के अर्थ के ज्ञान से रहित भाषा सार्थक नहीं कही जा सकती है। अत: शब्द कोश के ज्ञान की यह एक प्रमुख कला मानी जाती है। श्रीकृष्ण अपने जीवन के उत्तरार्ध में अनेक भक्तों–अनुयायियों से प्रश्नोत्तर करते समय जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, उस भाषा में उनके उस शास्त्रीय ज्ञान का रूप व्यक्त होता है जो अति परिष्कृत, पूर्ण, सुन्दर पारिभाषिक शब्दावली के माध्यय से ही अभिव्यक्त होता है। यथा–
श्रीमद्भागवत पुराण एकादश स्कन्ध के अन्तर्गत श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि–
एतदच्युत मे ब्रूहि, प्रश्नं प्रश्नविदांवर!
नित्यमुक्तो नित्यबद्ध एक एवेति मे भ्रमः ॥ 37 ॥–हे अच्युत ! आप प्रश्नों के जानकार हैं। आप प्रश्नों के समाधान जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, अत: यह प्रश्न जो मुझे भ्रमित करता है, उस प्रश्न का उत्तर दें। प्रश्न है कि– नित्य मुक्त कौन है? और नित्य बद्ध कौन है?
इसका उत्तर श्रीकृष्ण देते हैं–
बद्धो मुक्त इति व्याख्यागुणतो मे न वस्तुतः ।
गुणस्य माया मूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम् ॥1 ॥
आत्मनमन्यं च स वेद विद्वानपिप्पलादो न तु पिप्पलादः ।
योऽविद्यायायुक् स तु नित्यबद्धो विद्यामयो य: स तु नित्यमुक्तः ॥7 ॥यह भाषा सांख्य की परिभाषाओं से युक्त पदावली वाली है। यह सांख्य शास्त्र के वेत्ता सहज ही जान सकते हैं। इसमें किसी प्रकार का संदेह या अर्थ विभ्रम कहीं नहीं है। पूर्ण सरल सहज और स्पष्ट भाषा में गूढ़तम रहस्य की अभिव्यक्ति यहाँ हुई है। इस प्रकार की भाषा 'आभिधान कोश' कला के पूर्ण ज्ञान बिना, इस दर्शन को व्यक्र करने में सक्षम हो ही नहीं सकती है। अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण को इस अभिधानकोष की कला में पूर्ण निपुणता प्राप्त थी।

