संभूय क्रीड़ार्थं वादार्थं च तत्र पूर्वधारितमेको ग्रन्थं ।
पठति द्वितीयस्तमेवाश्रुतपूर्वं तेन सह तथैव पठति ॥सम्पाठ्यम् का अर्थ है– किसी के द्वारा पठित पाठ को भलीभाँति दोहराना, साथ–साथ स्वर मिलाकर पढ़ना। वैदिक मन्त्र पाठ, छात्रों का ग्रंथ पाठ, चारणों का स्तुति ज्ञान, रंगमंच पर समूह में काव्य पाठ अथवा गान आदि इस कोटि में आते हैं। श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में ( 21वें अध्याय) में भगवान श्रीकृष्ण जब उद्धव से वेद की चर्चा करते हैं तो वे शब्द–ब्रह्म की चर्चा करते हैं। वे नाभि से उत्पन्न प्राण के घोष को इस प्रकार बताते हैं कि वेद के उद्गीथ 'ऊँ' का पूरा उच्चारण सामने आ जाता है। ऐसा वर्णन वही कर सकता है, जिसने गुरु से स्वर वेद पाठ विधिवत् शिक्षा द्वारा प्राप्त किया हो, यथा–
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रि काण्डविषया इमे ।
परोक्षवादा ऋषय: परोक्षं मम च प्रियम् ॥35 ॥शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम् ।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥36 ॥ओङ्काराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्त: स्थभूषिताम् ।।39 ।।इसी प्रकार दशम स्कन्ध के 70वें अध्याय में श्रीकृष्ण की दैनिक चर्या का वर्णन आता है, वहाँ यह उल्लिखित है कि श्रीकृष्ण प्रतिदिन स्नान कर दैनिक संध्या और हवन करने के बाद जप किया करते थे, यथा–
अथाप्लुतोऽम्भस्यमले यथाविधि क्रियाकलापं परिधाय वाससी ।
चकार सन्ध्योपगमादि सत्तमोहुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यत: ॥अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण न केवल वेद मन्त्रों के ज्ञाता थे, अपितु वे उत्कृष्ट कोटि के वेदपाठी भी थे। वे वेद मन्त्रों का सस्वर गान और पाठ करने में अति कुशल थे।

