कामसूत्र के अनुसार ऐन्द्रजाल कला की व्याख्या इस प्रकार है–
इन्द्रजाला दिशास्त्र प्रभवा योगा: ।
सैन्य–देवालयादिदर्शनादहं भावविस्मापनार्था: ।।ऐन्द्रजाल शास्त्र में उत्पन्न योग है। विविध प्रकार के दृश्य आदि दिखाकर भुलावे में डालने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इस कला के द्वारा चमत्कार के दर्शन होते हैं। सत्य को तिरोहित कर असत्य की सृष्टि की जाती है। श्रीकृष्ण द्वारा इस कला के प्रयोग का भागवत में अनेक स्थानों पर वर्णन हुआ है। दशम स्कन्द के तैंतालीसवें अध्याय में वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण ने कंस के यज्ञ में आये हुए अनेक दर्शकों को अपने विविध रूपों का दर्शन कराया है, यथा–
मल्लानामशनिर्नृणां नरवर:, स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षिति भुजां शास्ता स्वपित्रो: शिशु: ॥
मृत्युर्भोंजपते र्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां पर देव तेति विदितो रङ्ग गत: साग्रज: ॥अर्थात् उस यज्ञ स्थल पर भगवान श्रीकृष्ण जब मंच पर पधारे तो उनका स्वरूप जिसके मन में जैसी भावना थी, उसी प्रकार का दिखा। वहाँ आये हुए मल्लों को वे वज्र के समान कठोर दिखाई दिए, वहाँ उपस्थित पुरुषों को वे पुरुष श्रेष्ठ रूप में लगे, वहाँ स्थित स्त्रियों ने श्रीकृष्ण को साक्षात् कामदेव के रूप में देखा, गोप–ग्वालों को वे स्वजन के रूप में प्रतीत हुए, दुष्ट जनों को वे कठोर शासक के रूप में प्रतीत हुए, माता–पिता को शिशु रूप में दिखे, भोजपति कंस को वे साक्षात् मृत्यु की मूर्ति के रूप में भयंकर प्रतीत हुए और अज्ञानियों को वे कंधों पर खून से सने हाथी दाँत रखे हुए अत्यन्त वीभत्स रूप में दिखे। श्रीकृष्ण को योगियों ने वहाँ परमतत्त्व के रूप में प्रत्यक्ष देखा तथा श्रीकृष्ण की बिरादरी के यादवों ने उन्हें पूज्य देवता के रूप में देखा। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अपने आपको दर्शकों की जैसी भावना थी, वैसे दर्शन दिए। यह चित्रण भी श्रीमद् भागवत में वेद व्यास जी ने अपनी तूलिका से बनाया है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने दुर्योधन की सभा में भी अपने को विविध रूपों में दर्शाया था। युद्धभूमि में भी अर्जुन को भी शुद्ध ज्ञान प्राप्त कराने के लिए विराट रूप में दर्शन कराये थे। इसी प्रकार बालक श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को अपने मुख में पूरा ब्रह्माण्ड दर्शन कराया था। ( श्रीमद्भागवत 10/8/7/36–37 ) ।

