कामसूत्र के अनुसार कर्णपत्र भंग कला की व्याख्या इस प्रकार है–
दन्त शंखादिभि: कर्ण पत्र विशेषा नेपथ्यार्था: ।यह कला कर्णाभूषणों से सम्बंद्ध है। इस कला का वर्णन कालिदास के रघुवंश ( 9/37 ) में भी आया है। उससे स्पष्ट होता है कि कवि कुलगुरु कालिदास के समय कामिनियों के कर्णों को सुशोभित करने के लिए पुष्पित अशोक ही नहीं, अपितु पल्लव भी कामोद्दीपक हो जाते हैं, यह वसंत में होता है। यथा–
कुसुम मेव न केवल मार्तवं नवमशोकतरो: स्मर दीपनम् ।
किसलयपसवोऽपि विलासिनां, मदयिता दयिता श्रवणार्पित: ॥श्रीकृष्ण जो समस्त कलाओं में अति निपुण हैं। वे कर्ण पत्र भंग कला में भी अति निपुण हैं। वेदव्यास जी ने गोचारण के लिए जाते हुए श्रीकृष्ण के अलंकृत देह का अति सुन्दर चित्र श्रीमद्भागवत पुराण में खींचा है।

