इस श्लोक में वेद की मूर्ति का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वेद पुरुष के छन्द दोनों पैर हैं, दोनों हाथ कल्प हैं, वेद पुरुष की आँखें ज्योतिष हैं, वेद पुरुष की नाक शिक्षा शास्त्र है, वेद पुरुष के कान निरुक्त हैं और मुख व्याकरण है। इस प्रकार जो वेद के इन अंगों सहित अध्ययन करता है, वह ब्रह्म लोक को प्राप्त होता है।
छन्द: पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोद्य पठ्यते।
ज्योतिषामयनं चक्षुनिरुक्तं श्रोत्रामुच्यते॥शिक्षाघ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
तस्मात्सांग मधीत्यैव ब्रह्म लोके महीमते॥इस प्रकार सभ्य समाज में छ: अंगों के सहित वेदाध्यन का प्रचलन था। श्रुति कहती है कि द्विज को अनिवार्य रूप से निष्कारण धर्माचरण तथा षड्ग वेदों का अध्ययन एवं मनन करना चाहिए-
ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्म: षड़ङ्गवेदोऽद्धेयो गेयश्च।इन छ: अंगों में व्याकरण शास्त्र को वेद पुरुष का मुख कहा गया है। मुख होने के कारण यह इनमें मुख्य है।

