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ज्योतिष

ऋग्वेद के अघमर्षण सूक्त में 10/190 विश्वोत्पत्ति का तथा पहले मण्डल 1/34/6 में विश्व संस्था का वर्णन है। सूक्त 1/95 में बताया है कि ऋतुओं का कारण सूर्य है, इसी प्रकार सूक्त क्रमांक 1/33 में कहा गया है कि पृथ्वी, गोल और निराधार है। काल वाची शब्द 'युग' का उपयोग भी पहले मण्डल के ही सूक्त 1/130 की चतुर्थ ऋचा में किया गया है।

वर्ष और दिनमान, इन दोनों शब्दों का प्रयोग क्रमश: सूक्त क्रमांक 1/164 के 41वें मंत्र में तथा आठवें मण्डल के सूक्त 48वें की सातवीं ऋचा में हुआ है। 'नक्षत्रों' का भी ऋग्वेद काल में ज्ञान था। इसका प्रमाण क्रमश: इन तीन ऋचाओं में, सूक्त 1/150 की दूसरी ऋचा में, सूक्त 10/68 की ग्यारहवीं ऋचा में और सूक्त 10/85 की दूसरी ऋचा में प्राप्त होता है। अत: हम कह सकते हैं कि -'ऋग्वेद कालीन ऋषियों को न केवल नक्षत्रों, मुहूर्त, युग और वर्ष का ज्ञान था, बल्कि अत्रि के सूक्तों से स्पष्ट ज्ञात होता है कि वे ग्रहण संबंधी ज्ञान प्राप्त करने में भी दक्ष थे।