कामसूत्र के अनुसार प्रहेलिका कला की व्याख्या इस प्रकार की गई है–
लोकप्रतीता क्रीड़ार्था वादार्था च ।प्रहेलिका का अभिप्राय है– पहेली पूछने की कला। प्रहेलिका की परिभाषा ग्रंथों में इस प्रकार बताई गई है–
व्यक्तिकृत्यकम पर्थ स्वरूपार्थस्य गोपनात् । यत्रवाह्यान्तरावर्थो कथ्यते सा प्रहेलिका ॥
या द्विधा अर्थी च शाब्दी च विख्याता प्रश्नशासने । आर्थी स्यात विज्ञान्नाच्छाब्दी शब्द विभागत: ॥तात्पर्य यह कि पहेली कूटार्थ भाषित करने की कला है। प्रहेलिका शब्द का अर्थ होता है– दुर्विज्ञानार्थ प्रश्न। प्रहेलिका चिर प्राचीन कला होते हुए भी चिर नवीन कला है। चिर प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में प्रहेलिका मौजूद है, उसी तरह वह आज भी हमारे घरों में मनोरंजन का साधन बनी हुई है। अब भी पहेली बूझना परस्पर विनोद के लिए होता है। 'विद्वमतमण्डन ग्रंथ' में इसकी परिभाषा दी है कि जो अर्थ व्यक्त किया जाता है, उसमें जिस वस्तु का स्वरूप छिपाया जाता है, वह कथन 'पहेली' कहलाता है। अर्थात् मुख्य अर्थ छिपा लिया जाता है और कोई दूसरा अर्थ प्रस्तुत किया जाता है, इसलिए मुख्य अर्थ के ढूँढने में बुद्धि भ्रमित हो जाती है। कबीर की उलटबाँसी बहुत प्रसिद्ध हैं, जैसे–
पानी विच मीन प्यासी । मुझे सुन–सुन आवे हाँसी ।ऋग्वेद में कई बार ब्रह्मोद्य नाम से प्रहेलिकायें पूछी गई हैं, इसमें पहली ऋचा में प्रश्न पूछते हैं और दूसरी ऋचा में उत्तर देते हैं। जैसे–
प्रच्छामि त्वा पदमन्तं पृथिव्या:, प्रच्छामि यत्र भुवनस्य नाभि: ॥
प्रच्छामि त्वा वृष्णो अश्वस्य रेत: । पृच्छामि वाच: परमं व्योम ॥अर्थात् मैं पूछता हूँ कि पृथ्वी का अन्त कहाँ है? मैं पूछता हूँ कि भुवन का मध्य कहाँ है? मैं पूछता हूँ कि वीर्यवान् अश्व का रेतस् क्या हैं? मैं पूछता हूँ कि परम् व्योम की वाणी क्या है अर्थात् वाणी का परम व्योम क्या है? अगली ऋचा में इस पहेली का उत्तर है–
इयं वेदि: परो अन्त: पृथिव्या:, अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि: ।
अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेता, ब्रह्माय वाच: परमं व्योम् ॥अर्थात् यह वेदि पृथ्वी का अन्त है। यह यज्ञ भुवन की नाभि अर्थात् समस्त भुवनों का केन्द्र है। यह सोम ही वीर्यवान् अश्व का रेतस् है, और ये परम् व्योम वाणी ब्रह्म है, अर्थात् वाणी ही ब्रह्म है। इसी प्रकार ऋग्वेद में अस्य वामीय सूक्त पहेलियों से भरा हुआ है। इस विद्या के सम्बंध में विद्वय–माधौ नामक ग्रंथ और 'उज्ज्वल नीलमणि' नामक वैष्णव शास्त्र में कुछ उदाहरण मिलते है जो यह संकेत करते हैं कि श्रीकृष्ण इस कला में अति निपुण थे।

