वेद प्रतिपादित कर्मों का सम्यक रूप से विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र 'कल्प' है। सूत्रों की आधार शिला 'कर्मकाण्ड' है। कल्प सूत्रों के मुख्यत: तीन भेद हैं- श्रौत्रसूत्र, गृहसूत्र और धर्म सूत्र। यज्ञादि विषयक विधान और विवरण देने वाले श्रौत्रसूत्र, गृहस्थ के समस्त कर्त्तव्यों और अनुष्ठानों का वर्णन करने वाले 'गृह्य सूत्र' तथा सामाजिक राजनैतिक, पारमार्थिक कर्त्तव्यों, विवाह आदि कृत्यों, उत्तराधिकार का विवरण प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ 'धर्म सूत्र' हैं। मुख्य रूप से इन सब कृत्यों के मूल बीज वेद के अभिन्न अंग हैं, जो वेद के ही विशिष्ट भाग माने जाने वाले ब्राह्मण ग्रन्थों में सन्निहित हैं। ऋग्वेद के ब्राह्मण जो आज प्राप्त हैं, वे हैं- ऐतरेय, कौशितकी और शांखायन। इन ब्राह्मणों में कल्प सूत्रों के प्रमुख बीज प्राप्त होते हैं। इस प्रकार शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प; इन छ: अंगों के मूल बीज ऋग्वेद संहिता में प्राप्त होते हैं। ब्राह्मण भाग भी वेद ही हैं।
प्राचीन ग्रन्थों में 'मंत्र' अर्थात 'संहिता' और ब्राह्मण व्याख्या दोनों को ही वेद माना है, जिसमें वेद के मंत्रों का संग्रह होता है, उसे 'संहिता ग्रंथ' कहते हैं। ब्राह्मण भाग मंत्रों के व्याख्यान हैं। मीमांसा एवं न्याय शास्त्र में वेद के विषय विभाग इस प्रकार किए गये हैं- विधि, अर्थवाद, नामधेय एवं निषेध।
ये सभी विषय विभाग मुख्यत: ब्राह्मणों में घटित होते हैं। कर्मकाण्ड के प्रतिपादक भाग का नाम 'ब्राह्मण', उपासना काण्ड के प्रतिपादक भाग का नाम 'आरण्यक' तथा ज्ञान काण्ड के प्रतिपादक भाग का नाम 'उपनिषद' है। इस प्रकार ब्राह्मणों में भी तीन अवान्तर विभाग होते हैं। यज्ञ की पूरी विधि ब्राह्मण ग्रन्थों में प्राप्त होती है। यज्ञ के मंत्रों की संगति, अर्थ की संगति के साथ कैसे बैठती है यह ब्राह्मणों में ही कहा है। वेद में आये पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या और उसका रहस्य ब्राह्मण ग्रन्थों में बताया है। इस प्रकार ब्राह्मण ग्रंथ ज्ञान-विज्ञान की विधि है। इसलिए 'आपस्तम्ब श्रौत्र सूत्र' ग्रंथ में कहा है- 'मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नाम धेयम।'
यही बात 'बोधायन गृह्य सूत्र' में भी कही गई है- 'मंत्र ब्राह्मणं वेद इत्याचक्षते।'
अगर हम विचार करें तो पाते हैं कि ऋषि आपस्तम्ब, यास्क, शबर स्वामी, पाणिनि, शंकराचार्य कुमारिल, मेधातिथि, उव्वर, सामर्ण आदि आचार्यों ने माना है कि- 'संहिता और ब्राह्मण दोनों की संज्ञा वेद है।' श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है कि 'भगवान श्रीकृष्ण ने और उनके भाई बलराम ने अपने गुरु सांदीपनि से- वेद की ब्राह्मणों के सहित आरण्यक, उपनिषद के साथ गुरु से शिक्षा प्राप्त की। प्रोवाच, वेदान, अखिलान, सांगोप्निषदों गुरु: स रहस्यं।
ऋग्वेद के तीन ब्राह्मण मिलते हैं- ऐतरेय, शांख्यान और कोषीतकी। ऋग्वेद का एक आरण्यक प्राप्त होता है- शांख्यान आरण्यक, जबकि ऐतरेय आरण्यक तथा कौषीतकी आरण्यक प्राप्त नहीं होता है। ऋग्वेद की प्रसिद्ध उपनिषद 'ऐतरेय उपनिषद' है। इन ऋग्वेद के भागों में वेदांङ्गों और शास्त्रों (धर्म शास्त्र, न्याय मीमांसा और पुराण) के संदर्भ अनेक स्थानों पर प्राप्त होते हैं। वैदिक साहित्य में कल्प का अतिशय महत्त्वपूर्ण स्थान है। कल्प, वेद प्रतिपादित कर्मों का भली-भाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसे 'वेद का हाथ' कहा गया है- 'हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।'
उन सूत्र ग्रंथों को कल्प कहते हैं जिनमें यज्ञ, याग आदि विधानों का, विवाह-उपनयन आदि महत्त्वपूर्ण संस्कारों का प्रतिपादन किया जाता है। ये अत्यंत प्राचीन ग्रंथ हैं- ऐतरेय आरण्यक में इसका वर्णन आया है। स्वरूप, कारण (सत्ता), विशेष, सामान्य और बहिरंग; इन पाँच शास्त्रों के द्वारा सिद्ध इन पाँच धर्मों से पूर्ण सिद्ध वस्तु तत्त्व का उपयोग कहाँ, कैसे और कब करना है, इन प्रश्नों का समाधान करने वाला शास्त्र 'कल्प शास्त्र' है।
शिक्षा, छंद, व्याकरण और निरुक्त यह चारों वाक् भाग का संस्कार करते हैं। ज्योतिष 'मानस विवर्त' का परिशोधन करता है और यह 'कल्प शास्त्र' प्राण भाग को सुसंस्कृत बनाता है। पहले के पाँच अंग शास्त्रों के द्वारा जो ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसके परिज्ञान के बिना यह शास्त्र (कल्प शास्त्र) सर्वथा निर्बल है। वास्तव में शिक्षा, छंद, व्याकरण, निरुक्त और ज्योतिष इन सबका अनुप्रयोग कल्प शास्त्र करता है। यह बात मानी हुई है कि प्रत्येक वस्तु तत्त्व को उपयोग में लाने से पहले उसके स्वरूप, कारण, विशेष, सामान्य और बहिरंग इन पाँच धर्मों का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है, तभी वह विशेष प्रासंगिकर बन जाता है। उपनिषद में कहा है- 'यदैय विद्याया करोति श्रद्धयौपनिषदा तदैव व्यक्त तरम् भवति।' इस (अमुक) अर्थ से क्या अतिशय उत्पन्न किया जा सकता है? किस कुशलता से अमुक अर्थ प्राप्त किया जा सकता है? अमुक अर्थ के अनुष्ठान से क्या फल सिद्धि संभव है? इन सब विशेषों की उत्पत्ति (संगति) जान लेने से विज्ञानी पुरुष सरल भाव से कर्म की इति कर्तव्यता प्रवृत्त होता हुआ सफल बन जाता है। इसी उपयोगिता के ज्ञान के साधक शास्त्र का नाम 'कल्प शास्त्र' है।
कल्पसूत्र में तीन भेद मिलते हैं- श्रौत सूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र। श्रौत सूत्रों में सात हविर्यज्ञ, सात पाक यज्ञ, सात सोम यज्ञ हैं। इस प्रकार 21 यज्ञों का वर्णन है।
अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास, आग्राहारिण, चातुर्मास्य, निरुपशुबंध और सौत्रामणि। यह सातों चरू, पुरोडाश द्वारा हवि से संपन्न किए जाते हैं, इसीलिए यह 'हविर्यज्ञ' कहलाते हैं।
अग्निष्टोम, अत्यअग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा आपोयाम; इन सातों में सोमरस का प्राधान्य रहता है, इसलिए इन्हें 'सोम यज्ञ' कहते हैं।
(आश्वलायन, लाट्यायन आदि श्रौत सूत्रों में इन चौदह यज्ञों का विस्तृत विवरण मिलता है।)
पितृयज्ञ (पितृ श्राद्ध), पार्वण यज्ञ (पूर्णिमा और अमावस्या को किया जाने वाला यज्ञ), अष्टका यज्ञ, श्रावणी यज्ञ, आश्रयजि यज्ञ (आश्विन मास में किया जाने वाला यज्ञ, जो अब कोजागरू, लक्ष्मी पूजा का रूप ले चुका है), आग्रहारिणी (अगहन में किए जाने वाला यज्ञ, नवान्न का अनुकल्प बन चुका है) एवं चैत्री यज्ञ (चैत्र में किया जाने वाला) ये यज्ञ सात पाकयज्ञ कहलाते हैं।
इन इक्कीस यज्ञों के अतिरिक्त पाँच महायज्ञों का वर्णन मिलता है।
देव यज्ञ, भूत यज्ञ, पितृ यज्ञ, ब्रह्म यज्ञ एवं मनुष्य यज्ञ।
हवन को 'देव यज्ञ' कहते हैं। दान करने को 'भूत यज्ञ' कहते हैं। पिंडदान और तर्पण को 'पितृ यज्ञ', वेदों के अध्ययन-अध्यापन एवं मंत्र पाठ को 'ब्रह्म यज्ञ' तथा अतिथि सेवा एवं अन्न दान देने को 'मनुष्य यज्ञ' कहते हैं।
प्राचीन साहित्य से हमें पता चलता है कि प्रत्येक शाखा के कल्प ग्रंथ थे अर्थात् वेद की एक शाखा में कम से कम तीन प्रकार के कल्प ग्रंथ अवश्य थे अर्थात् श्रौतसूत्र गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। यह भी सर्वविदित है कि प्राचीन काल में ऋग्वेद की इक्कीस, यजुर्वेद की एक सौ इक्कीस, सामवेद की एक हजार और अथर्ववेद की नौ शाखाएँ थीं। इस प्रकार चारों की एक हजार एक सौ इक्कीस शाखाएँ थीं, पर आज तो इनमें से चालीस भी शाखाएँ बड़ी मुश्किल से मिलती हैं, वह भी यूरोपीय विद्वानों की कृपा से। यदि यूरोपीय विद्वानों की कृपा नहीं होती तो हमें इन अमूल्य ग्रंथों कल्पसूत्रों के दर्शन भी नहीं होते। जिस तरह हमें श्रौतसूत्रों से श्रौतयज्ञ, पाकयज्ञ, सोमयज्ञ और पंचमहायज्ञ का वर्णन मिलता है, उसी प्रकार गृह्यसूत्रों में संस्कारों का वर्णन तथा पंचमहायज्ञों का वर्णन भी मिलता है। संस्कार मुख्य रूप से सोलह हैं- गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोनयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, उपनयन, वेदाध्ययन, महाव्रत, उपनिषदव्रत, गोदानव्रत, समापवर्तन, विवाह एवं अंत्येष्टि। इस प्रकार चौदह श्रौतयज्ञ, सात पाकयज्ञ, पाँच महायज्ञ और सोलह संस्कार मिलाकर बयालीस कर्म हमारे लिए कल्प सूत्रों ने बताए गये हैं। इन बयालीस कर्मों का विस्तृत वर्णन पढ़ने पर हमें अपने पूर्वजों की सारी जीवन लीला दर्पण की तरह साफ-साफ दिखाई देती है। प्राचीन सनातनी जीवन, समाज तथा धर्म को समझने के लिए यह कल्पसूत्र अद्वितीय ग्रंथ हैं। वैदिक संहिताओं का अर्थ तत्त्व और रहस्य समझने के लिए भी ये अति महत्त्वपूर्ण हैं। हिंदू संस्कारों, राजधर्मों, दंपति धर्मों, दायभागों आदि को कल्पसूत्रों के बिना समझना संभव नहीं है।

