कामसूत्र के अनुसार रूप्यरत्न परीक्षाकला की व्याख्या इस प्रकार है–
रूप्य माहतद्रव्यं दीनारादि, रत्नं वज्रमणि मुक्तादि ।
तेषां गुण– दोष– मूल्यादिभि:, परीक्षा व्यवहारांगम् ॥रूप्यरत्न परीक्षा का अर्थ है कि सिक्कों और रत्नों की परीक्षा करने की क्षमता अर्थात् उन्हें देखकर या छूकर यह जानना कि यह श्रेष्ठ है अथवा निकृष्ट ( नकली) हैं?
श्रीकृष्ण इस कला में भी अति निपुण थे। उन्होंने गुरु से एवं स्वयं भी भ्रमण करके रत्नों की परीक्षा का अद्भुत गुण प्राप्त कर लिया था। श्रीमद्भागवत पुराण में दसवें स्कन्द के पचासवें अध्याय के अन्तर्गत द्वारका नगरी बसाने के सम्बन्ध में जहाँ वर्णन आया है, वहाँ श्रीकृष्ण ने उस नगरी के निर्माण में स्वर्ण आदि धातुओं, स्फटिक और मरकत रत्नों तथा रत्न कूटों के विनियोग की यथास्थान चर्चा की है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी इस विषय में विश्वकर्मा जी को विभिन्न रत्नों और धातुओं का प्रयोग करने की आज्ञा प्रदान की है।
सबसे महत्त्वपूर्ण संदर्भ श्रीमद्भागवत के दसवें स्कन्द के अध्याय 56 में आया है–
प्राहनासौ रविर्देवः, सत्राजिन्मणिना ज्वलन् ॥ 9 ॥
सत्राजित् स्वगृहं श्रीमत् कृतकौतुक मङ्गलम् ।
प्रविश्य देवसदने, मणिं विप्रैर्न्यवेशयत् ॥10 ॥दिनेदिने स्वर्णभारा नष्टौ स सृजति प्रभो ।
दुर्भिक्षमार्यरिष्टानि सर्पाधिव्याधयोऽशुभाः ।
न सन्ति मयिनस्तत्र यत्रास्तेऽभर्चितो मणिः ॥– द्वारका नगरी में सभा के मध्य में श्रीकृष्ण विराजे हैं। वे यादव गणों के बीच में शोभा पा रहे हैं, ठीक इसी समय सत्रजित स्यामंतक मणि को हृदय प्रदेश पर धारण किए हुए वहाँ आता है।
मणि के तेज से तेजस्वी सत्रजित को देखकर यादवगण श्रीकृष्ण से कहते हैं– 'हे कृष्ण ! यह लगता है कि साक्षात सूर्यदेव आपके दर्शनों के लिए आ रहे हैं, उनके तेज के कारण हमारी आँखें चकाचौंध से भर गयी हैं, हमें चाहिए हम इनका उठकर सम्मान करें ।'
श्रीकृष्ण ने यह सुना तो वे हँसते हुए कहते हैं– यह सूर्य देव नहीं, यह तो सत्रजित है जो मणि के तेज की प्रभा से मण्डित है। सत्रजित ने यह मणि श्री सूर्य देव की कृपा से प्राप्त की है। इस मणि का नाम 'स्यमन्तक मणि' है यह मणि प्रति दिन आठ भार सोने को उत्पन्न करती है। इस मणि का गुण है कि जहाँ यह रहती है, वहाँ व्याधियाँ और सर्प आदि का संकट नहीं होता, वहाँ किसी भी प्रकार का दुर्भिक्ष नहीं होता, किसी प्रकार की राक्षसी माया नहीं चलती।
स्पष्ट है कि जो श्रीकृष्ण देखकर ही किसी मणि के समस्त गुणों को जान सकते हैं, वे निश्चित ही रूप्यरत्न परीक्षा कला में निष्णात हैं।
मणिरागाकर ज्ञान, रूप्यरत्न परीक्षा, धातुवाद और तक्षकर्म यह चारों कलाएँ परस्पर अन्योन्याश्रित हैं और एक–दूसरे की पूरक भी हैं।

