कामसूत्र के अनुसार 'मणिभूमिका कर्म' की व्याख्या इस प्रकार है–
मणिभूमिका कृत कुट्टिमा भूमि: ग्रीष्मे शयना पानकार्थ तस्यां मरकर्तादिभेदेन करणम् ॥मणिभूमिका कर्म का अर्थ हैं– घर की भूमि फर्श आदि को मणियों से जड़कर सजाना। गर्मी के मौसम में शयन आदि के लिए फर्श, स्नान के लिए वापी तडाग की सीढ़ियाँ और पीने के बर्तनों को मणियों से सजाना। यह सभी कार्य मणिभूमिका कर्म कला के अन्तर्गत गिने जाते हैं।
इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गंद्वादशयोजनम् ।
अन्तः समुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत् ॥ 50 ॥
हेमश्रृङ्गैर्दिदिविस्पृग्भि: स्फाटिकाट्टालगोपुरै: ॥ 52 ॥
राजतारकुटै: कोष्ठै हेंम कुम्भैरलङ्कृतै: ।
रत्नकूटैगृहै है हैंर्महामरकत स्थलै: ॥ 53 ॥श्रीकृष्ण ने जब समुद्र में द्वादश योजन की द्वारिका का निर्माण किया। उस समय श्रीकृष्ण ने वह नगरी किस प्रकार की निर्माण की थी, यह व्यास जी ने श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्द में बताया है। वे कहते हैं– 'समुद्र के अन्दर उस अद्भुत नगर को ( द्वारिका को ) इस प्रकार निर्माण किया कि इसमें आकाश को छूते हुए शुद्ध सोने के शिखर थे। उसकी अट्टालिकाएँ, गोपुर, अर्श आदि भी स्फटिक के बने हुए थे। स्वर्ण के कोठे तथा रत्न कूटों से बने गृह थे, जिसमें विभिन्न स्थल और वेदियाँ मरकतमणि से बनी हुई थीं।' स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण मणिभूमिका कर्म कला में पूर्ण पारंगत थे, तभी तो वे ऐसी द्वारिका नगरी का निर्माण करने में सफल हो सके थे।

