कामसूत्र के अनुसार 'शयन रचना' की व्याख्या इस प्रकार से की गई है –
शयनीयस्य कालापेक्षया रक्त विरक्त मध्य स्थामिप्रा यादाहार परिणति वशाच्च रचनम् ॥शयन रचना में सुखद शैय्या की कला निहित है। व्यक्ति विशेष की अवस्था, ऋतु एवं प्रसंग के अनुसार शय्या की रचना होती है।
राधा सा स्वामिना सार्धं पुष्प चन्दन चर्चिता ।
पुष्प चन्दन तल्पे च तस्थौ रहसि नारद ॥31 ॥यहाँ यह कहा गया है कि पुष्प चन्दन से चर्चित होकर श्रीराधा श्रीकृष्ण के साथ एकान्त में चन्दन से बनी हुई पुष्प चन्दन चर्चित शय्या पर विराजमान हुई। इस शय्या को श्रीकृष्ण ने ही रचा था। रासेश्वरी के लिए श्रीकृष्ण ने ही यह सेवा कार्य किया। श्रीकृष्ण शयन रचना कला में पारंगत हैं, यह स्पष्ट होता है। एक अन्य स्थान पर आया है–
चकार पुष्प शय्यां च गोपी चन्दन चर्चितां ।
अव्रलाम मालती पुष्पमाला जाल विभूषिताम् ।
रत्नेन्द्र सार निर्माण मंदिरे सुमनोहरे ॥अर्थात् सुन्दर गोपीचन्दन से चर्चित पुष्प शैय्या श्रीकृष्ण तैयार की, जो खिले हुए मालती के पुष्पों की मालाओं से अलंकृत थी। यहाँ स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि यह शैय्या जो राधा के लिए तैयार की गई थी, जिस पर बाद में राधा–माधव साथ विराजे, वह मालती पुष्पों से निर्मित थी और चन्दन चर्चित थी।

