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उदक वाद्य

जल तरंग बजाना

कामसूत्र के अनुसार उदक वाद्य कला की व्याख्या इस प्रकार से की गई है–

उदके मुरजा दिवद् वाद्यम् ।

उदकवाद्यम् का अभिप्राय है जल पर हाथ से इस प्रकार आघात करना की मृदंग आदि वाद्यों जैसी ध्वनि उत्पन्न हो। उदकाघात अर्थात् मनोरंजन के लिए हाथ से या जल यन्त्र से एक–दूसरे पर जल के छींटे मारना। यह दोनों कलाएँ जल क्रीड़ा से संबद्ध हैं। जल स्त्रोतों में अवगाहन दैनिकचर्या भी थी और मनोविनोद का साधन भी थी। श्रीकृष्ण के जीवन में जल–क्रीड़ा बचपन में भी मनोरंजन का साधन थी और बाद की युवावस्था में भी यह मनोविनोद का प्रमुख साधन बनी रही। इसके दो उदाहरण हैं, पहला– श्रीकृष्ण के बालपन में जब उन्होंने किशोर अवस्था के पहले ही आठ वर्ष की आयु में गोपियों के साथ रास–क्रीड़ा की थी, तब–

ता: समादाय कालिन्द्या निंविश्य पुलिनंविभु: । विकसत्कुन्द मन्दार सुरभ्यनिलषट्पदम् ॥

यहाँ श्रीकृष्ण यमुना में गये हैं तो यमुना ने अपनी कोमल बालुका उनकी और गोपियों की रासक्रीड़ा के लिए आसन के रूप से विस्तीर्ण कर दी। उसी कालिन्दी के बालुकामय तट पर भगवान ने रासक्रीड़ा संपन्न की यह जल–क्रीड़ा का आरंभ है। ( भागवत पु.,10/32/11 )

जल–क्रीड़ा का दूसरा उदाहरण भी श्रीमद्भागवत में 69वें अध्याय में वर्णित है।