कामसूत्र के अनुसार प्रतिमाला कला की व्याख्या इस प्रकार है–
अन्त्याक्षरिकेति प्रतीति: । प्रतिश्लोकं क्रमाद्यत्र संधायाक्षरमन्तिमम् ।
पठेतां श्लोकमन्योन्यं प्रतिमालेति सोच्यते ॥यह काव्यात्मक विनोद की कला है। इसके वर्णन से यह प्रतीत होता है कि यह काव्यात्मक विनोद आधुनिक अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता का ही एक रूप है। इसमें दो समूहों में बँटे हुए प्रतिभागियों में से किसी एक के द्वारा उच्चारित काव्य के अंतिम अक्षर से आरम्भ कर द्वितीय पक्ष की ओर से श्लोक पाठ किया जाता है। यह प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में प्रचलित काव्यात्मक विनोद है। श्रीकृष्ण के जीवन में स्पष्ट रूप से ऐसी कोई घटना तो नहीं मिलती जिसमें उन्होंने काव्यात्मक विनोद को अपरोक्ष रूप से प्रयोग किया हो, किन्तु परोक्ष रूप के उदाहरण अनेक हैं। जैसे– श्रीमद् भागवत महापुराण ( एकादश स्कन्द के अन्तर्गत एकादशवें अध्याय) में भगवान श्रीकृष्ण ने जब उद्धव के प्रश्न का उत्तर दिया है, उस समय की भाषा का यह उदाहरण है–
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वत: साध्व साधु वा ।
वदतो गुण दोषाभ्यां वर्जित: समदृङ्मुनि: ॥16 ॥न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्व साधुवा ।
आत्मरामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनि: ॥17 ॥इन दोनों छन्दों को गंभीरता से निरीक्षण करते हैं तो हम पाते हैं कि ये छन्द प्रतिमाला कला के स्पष्ट उदाहरण हैं। पहला छन्द 'न' अक्षर से प्रारम्भ होता है और 'न' अक्षर में अपनी परिसमाप्ति प्राप्त करता है। अगला छन्द फिर इसी अन्तिम अक्षर 'न' से प्रारम्भ होता है और अन्त में जाकर पुन: 'न' अक्षर पर समापन को प्राप्त करता है। तात्पर्य यह है कि अन्त्याक्षरी का यह उदाहरण इस प्रकार का है कि प्रतियोगी को धराशायी करने के लिए पुन: उसी अक्षर पर खींचकर लाया गया है।
अत: हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण इस कला में पूर्ण रूप से निपुण थे।

