कामसूत्र के अनुसार पुस्तक–वाचन कला की व्याख्या इस प्रकार से है–
भरतादिकाव्यानां पुस्तकस्थानां श्रृँगारादिरसापेक्षया गीतत: स्वरेण वाचनम् ।
अनुरागजननार्थमात्मविनोदार्थम् च ॥मधुर और स्पष्ट वाणी में संयोग–वियोग, श्रृँगार–करुण, हास्य, वीर, रौद्र आदि रसों के निष्पादन के साथ पुस्तक–वाचन भी एक कला है। महाभारत, पुराण, इतिहास, रामायण ग्रंथों के पठन में इस कौशल का प्रयोग होता है। श्रीमद्भागवत पुराण ( एकादश स्कन्ध, अध्याय 23 ) के अंतर्गत भगवान ने कहा है कि इसमें उन्होंने एक प्राचीन गाथा को स्वयं गाया है, जो विद्वानों में द्विज गीत नाम से प्रसिद्ध है। यह भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा गाई वह गाथा है जो प्राचीन काल से प्रचलित थी। श्रीकृष्ण द्वारा अध्याय 23 के एकादश स्कन्ध में 43वें श्लोक से लेकर 58वें श्लोक तक यह गाथा गाई गयी है। – ( भाग.पु. 11/23/45–58 )
यह पुस्तक–वाचन कला का एक सशक्त प्रमाण है।
इसी प्रकार श्रीमद्भागवत् में वर्णन आता है कि एक बार जब नारद ऋषि श्रीकृष्ण के द्वारा स्थापित द्वारिकापुरी में गये तो उन्होंने देखा कि सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियों के साथ श्रीकृष्ण अपना गृहस्थ–धर्म निर्वाह कर रहे हैं। यह जानने और देखने के लिये ही तो वे गये थे। नारद ऋषि ने तब देखा था कि वे एक भवन में देवताओं के लिये मन्त्रों के साथ यज्ञ कर रहे हैं।
यजन्तं सकलान् देवान् क्वापि क्रतुभिरूर्जितै: ...... ॥34 ॥स्पष्ट है कि यज्ञ में श्रीकृष्ण स्वरों के साथ वेदमन्त्रों का पाठ करने में अति कुशल थे। इस प्रकार श्रीकृष्ण 'पुस्तकवाचन कला' में पूर्ण निपुण थे।

