कामसूत्र के अनुसार शेखर कापीडयोजन कला की व्याख्या इस प्रकार है–
शेखर कस्य शिखा स्थानेऽ वलम्बन न्यासेन परिधापनात् ।
आपीड़स्य मण्डलाकारेण ग्रथितस्य परिधापनात् ।
नानावर्णै: पुष्पै विरचनं योजनम् । नागरकस्य प्रधानं नेपथ्यांगम् ॥शेखरकापीडयोजन का अर्थ है– केशों का जूड़ा बनाना। केश राशि में विविध पुष्पों को अलंकार के रूप में गूँथ देना। वेणी को अनेक प्रकारों से सुसज्जित करना शेखर कापीडयोजन कला के अन्तर्गत आता है। और इसमें माल्यग्रंथन कला से यह अन्तर है कि जहाँ माल्यग्रंथन में भिन्न–भिन्न प्रकार से अनेक प्रकार की मालाओं की रचना की जाती है, वहीं शेखरकापीडयोजन कला के अन्तर्गत बालों के जूड़ा को अनेक प्रकार की आकृतियाँ देकर अलंकृत करते हैं।
श्रीकृष्ण इस कला में भी अति निपुण थे। वे अपनी केश राशि को सजाते थे और राजेश्वरी श्रीराधा की केश राशि को भी समय–समय पर सजाया करते थे। ब्रह्म वैवर्त पुराण के उत्तरार्द्ध के अध्याय 69 में राधा–कृष्ण की क्रीड़ा का वर्णन है, वहाँ व्यास जी ने बताया कि श्रीकृष्ण ने श्रीराधा की केश राशि का श्रँगार किया है–
कबरीं रचयामास ददौ कुंकुम चन्दनम् ।इस प्रकार से श्रीकृष्ण शेखरकापीडयोजन कला में भी निपुण थे।

