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वैनायिकी विद्या

विनय और अनुशासन

कामसूत्र के अनुसार वैनायिकी विद्या की व्याख्या इस प्रकार है–

स्वपरविनयप्रयोजनाद्वैनिक्यआचारशास्त्राणि । हस्त्यादि–शिक्षा च ।

विनम्रता का आधन करने वाली विद्याओं का परिज्ञान भी एक कला है। धर्म, आचार, नीति, दर्शन शास्त्रों और गुरु के उपदेश द्वारा विनय भाव को सीखना 'स्वविनय' है, और हाथी–घोड़े आदि को वश में करना, हस्ति शिक्षा, अश्व शिक्षा आदि का ज्ञान 'परविनय' है। यह दोनों मिलकर 'वैनायिकी विद्या' कहलाते हैं। श्रीकृष्ण में यह दोनों विद्याएँ ( स्वविनय और परविनय) परिपूर्ण रूप से विकसित थीं, इसके अनेक उदाहरण महर्षि वेदव्यास ने यथास्थान दिये हैं, जैसे– उन्होंने अति विनयपूर्वक शास्त्रों के ज्ञान के आधार पर अपने परिवार के प्रौढ़ जनों को और ब्रज के गोपों को इन्द्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए राजी कर लिया था और फिर गोवर्धन की पूजा समस्त ग्वालबालों के साथ सम्पन्न हुई थी। ( श्रीमद्भागवत पुराण, 10/24 ) ।

दूसरा उदाहरण–श्रीमद्भागवत महापुराण के अन्तर्गत कुबलयापीड़ वध प्रसंग में आता है, वहाँ श्रीकृष्ण ने कुबलयापीड़ नामे के हाथी को जो कि हाथियों के समूह में सबसे शक्तिशाली माना जाता था, उसे बड़ी आसानी से परास्त किया था–

अम्बष्ठाम्बष्ठ मार्गं नौ देह्यपक्रम मा चिरम् । नो चेत् सकुञ्जरं त्वाद्य नयामि यमसादनम् ॥ 4 ॥
पतितस्य पदाऽऽक्रम्य मृगेन्द्र इव लीलया । दन्तमुत्पाट्य तेनेभं हस्ति पांश्राहनद्धरिः ॥ 14 ॥
– ( श्रीमद्भाग.महा. पु.10/43/4–14 )

इस वर्णन से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण हाथी के स्वभाव से पूर्ण परिचित थे तथा हस्तियुद्ध की विद्या में पूर्ण निपुण थे।