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व्यायामिकी

कामसूत्र के अनुसार व्यायामिकी कला की व्याख्या इस प्रकार हैं–

व्यायामप्रयोजना मृगयाद्याः । एतास्तिस्र आत्मोत्कर्ष– रक्षणार्था जीवार्था: ॥

व्यायाम विद्या का प्रथम उद्देश्य है– आत्मोत्कर्ष अर्थात् स्वयं की उन्नति, शारीरिक और मानसिक उन्नति जैसे प्राणयाम। दूसरा उद्देश्य है– दूसरे जीवों की रक्षा करने के लिए शरीर को शक्तिशाली बनाना और तीसरा उद्देश्य है– दीर्घायु प्राप्त करना। अष्टांग योग इन तीनों लक्ष्यों को पूरा करता है, ऐसा कामसूत्र में कहा गया है। इसी व्यायाम विद्या के अन्तर्गत किशोरा अवस्था में खेल, मृगया, तैरना, वृक्ष पर चढ़ना, पर्वारोहण करना और मल्ल विद्या ( कुश्ती) आदि क्रियायें ग्रहीत होती हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार श्रीकृष्ण का जीवन इस प्रकार व्यतीत हुआ है, कि उसमें व्यायाम विद्या स्वत: विकसित होती रही है। गुरु के आश्रम में तो उन्होंने इन विद्याओं को गुरु मुख से सिखा ही था, जिन्हें वे पूर्व में आयत्त कर चुके थे, जब वे गौचारण के लिए वन में जाते थे, तो वहाँ उन्हें स्वभाविक रूप से पर्वतारोहण, छुद्र नदियों को पार करना, ग्वाल–बालों के साथ जल क्रीड़ा करना, वृक्षों पर चढ़ना और मल्ल आदि करना तो होता ही था, इसलिए ये कलाएँ उनमें परिपूर्ण रूप से विकसित हो गई थीं। दसवें स्कन्ध के 43वें अध्याय में श्रीकृष्ण अपने मामा कंस के यज्ञ समारोह में अपनी मल्ल विद्या का भरपूर प्रदर्शन करते हैं।

एवं चर्चित संकल्पो भगवान मधु सूदनः । आससादाथ चाणूरं मुष्टिकं रोहिणी सुतः ॥1 ॥
भूपृष्ठे पोथयामास तरसाक्षीण जीवितम् । विस्रस्ता कल्प केशस्रगिन्द्रध्वज इवापतत् ॥23 ॥
–( श्रीमद्भाग.पु.10/44/01–23 )

अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण ने चाणूर से और बलराम जी ने मुष्टिक नामक मल्ल से लड़ना शुरू किया। वे आपस में हाथों से हाथ और पाँव से पाँव लगाकर जीतने की इच्छा से बलात् खींचने लगे, फिर एक–दूसरे के घुटनों में घुटना, सिर में सिर छाती में छाती परस्पर भिड़ाने लगे। चौतरफा घुमाना, धक्का देना, हाथ में लेकर दाबना, नीचे पछाड़ना, फिर छोड़कर आगे बढ़ना, फिर पीछे हटना ऐसी क्रियाओं से एक–दूसरे को रोकने लगे। घुटना और पाँव को समेटकर पड़े हुए को सरकाना, हाथ से उठाकर ले जाना, गला पकड़ना, चिपटे हुए को दूर हटाना, पाँव को समेटना ऐसी क्रियाओं से, दोनों विजय की इच्छा से एक–दूसरे को पीड़ित करते थे। श्रीकृष्ण चाणूर से लड़ रहे थे। उनके शरीर के आघात से चाणूर के अंग–अंग टूट से गये। वह बारम्बार थकने लगा। तब उस मल्ल चाणूर ने वेग से उछलकर दोनों हाथों की मुट्ठियों को बाँधकर श्रीकृष्ण के वक्षस्थल पर प्रहार किया, किन्तु श्रीकृष्ण बिलकुल ही न डिगे। उन्होंने चाणूर मल्ल के दोनों हाथों को पकड़कर घुमाया, फिर अखाड़े की भूमि पर जोर से पटक दिया। इससे उसके प्राण निकल गये। इस वर्णन से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण व्यायाम कला में अति निपुण थे। मल्ल विद्या के दाँव–पेंच उन्हें पूरी तरह से ज्ञात थे।