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व्याकरण

  • व्याकरण शास्त्र

व्याकरण शास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन काव्यायन मुनि ने बताया है कि -

'रक्षोहागमलध्वसंदेहा: व्याकरण प्रयोजनम्।'

अर्थात् रक्षा, उफह, आगम, लघु एवं असंदेह; यह पाँच व्याकरण के अध्ययन के प्रयोजन हैं।

पतंजलि मुनि ने कहा है कि वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण पढ़ना चाहिए। व्याकरण के नियम के अनुसार वर्ण-लिपि आदि के ज्ञान के बिना शास्त्रों के समुद्र स्वरूप वेद का परिपालन नहीं हो सकता। व्याकरण के ज्ञान के अभाव में मंत्रों में विकार उत्पन्न हो जायेगा।

उफह का अर्थ तर्क-वितर्क अर्थात् नूतन पदों की कल्पना। वेद में जो मंत्र कहे गये हैं, वे सब लिंगों में और विभक्तियों में नहीं हैं, इसलिए उन मंत्रों में यज्ञ में परिस्थिति के अनुसार चाहे हुए रूप, लिंग और विभक्ति का व्यवहार करना चाहिए। यह कार्य व्याकरण द्वारा ही संभव है, इसलिए व्याकरण पढ़ना चाहिए।

ब्राह्मण का कर्त्तव्य है कि वह अंग सहित वेद का अध्ययन करे, ऐसा स्वयं वेद कहता है। छ: अंगों में व्याकरण मुख्य है। अत: श्रुति को प्रमाण मानकर व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए।

श्रुति कहती है कि देवगुरु वृहस्पति ने इन्द्रदेव को दिव्य सहस्त्र वर्षों तक विद्या का अध्ययन कराया, फिर भी विद्या का अन्त नहीं हुआ, इसलिए संक्षेपीकरण की आवश्यकता हुई। अतएव महर्षि पतंजलि ने कहा कि शास्त्र का लघुता संपादन प्रयोजन है, व्याकरण का प्रयोजन भी लघुता संपादन है।

संदेह को दूर करने के लिए व्याकरण का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। व्याकरण शास्त्र का अध्ययन शब्दों के यथार्थ ज्ञान के हेतु करना चाहिए। पतंजलि कहते हैं-

एक: शब्द: समग्ज्ञात: शास्त्रान्वित:। सुप्रयुक्त: स्वर्गलोके च कामयुग भगवती॥

अर्थात् एक शब्द का भी ज्ञान करके यदि शास्त्र के अनुसार इसका प्रयोग किया जाये तो स्वर्ग लोक में और इस पृथ्वी पर, दोनों जगह सफलता प्राप्त होती है। अत: व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है।

व्याकरण को समझने के लिए पहले आवश्यक है कि वह कुछ आधारभूत बातें समझें। यदि व्याकरण को समझना चाहते हैं तो इस बात को समझें कि संक्षिप्त का विवरण ही व्याकरण है या एक के विविधाकार होने का समर्थन ही व्याकरण है- एकस्य विविधकारत्वं।

एक तत्त्व अनेक भावों में परिणित हो जाता है, बदल जाता है, इसे कहते हैं व्याकरण। सामान्य लक्षण वाले एक ही तत्त्व का अनेकधा प्रतिपादन होने लगता है। प्रत्येक पदार्थ या तत्त्व छ: (क्षय) परिस्थितियों के कारण अपने स्वरूप बदलता है- उत्पत्ति, बुद्धि, स्थिति, छा:, संहार एवं विपरिणाम। इन भावों के आधार पर एक ही तत्त्व अनेक प्रकार से प्रतिपादित होने लगता है।

अर्थात् सामान्य लक्षण वाले एकत्व के आधार पर विशेष लक्षण वाले अनेकत्व विकसित हो जाते हैं। यही व्याकरण शास्त्र का आधार है। जैसे घट एक तत्त्व है और पट एक दूसरा तत्त्व है और प्राणी एक तीसरा तत्त्व है। यही प्रत्येक एक जाति के होते हुए भी अनेक रूपों में बदलते देखे जाते हैं। यह हैं व्याकृतियाँ। नाम और रूप इन व्याकृतियों के मुख्य प्रवर्तक हैं। आख्यात, उपसर्ग निपात, प्रकृति प्रयत्न स्वर और वर्ण आदि सम्पूर्ण व्याकृतियों का नाम और रूप में ही अन्तरभाव हो जाता है। प्रत्येक पदार्थ में आत्मकर्म और अनात्मकर्म इन दो धर्मों का समावेश होता रहता है। आत्मधर्म की हानि से वस्तु का स्वरूप नष्ट हो जाता है। इसलिए आत्मकर्म को स्वधर्म कहा जाता है और यह आत्मकर्म (आत्मधर्म) छन्दों धर्म में गिना गया है।

अनात्मधर्म से एक ही वस्तु अनेक रूपों में परिणित हो जाती है। इन नाना विधि रूपों के रहस्य को प्रतिपादन करने वाला अर्थात् व्याकृति तत्त्व का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र व्याकरण है। जैसे- घर एक धातु है, इस एक धातु से घटा:, घटनम्, घट:, घटते इन विविध भावों का अर्थात् व्याकृति तत्त्व का प्रतिपादन व्याकरण पर अभिलंबित है। इसीलिए कहा है कि एक का विविधकरण करने वाला शास्त्र व्याकरण है।

निष्कर्ष यह है कि शब्द के अर्थ ज्ञान के लिए व्याकरण शास्त्र पढ़ा जाता है। कहावत है कि-

यद्यपि बहुनापाठे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्। स्वजन: श्वजनो मा भूत् सकलं शकलं सकृच्छकृत।।

अर्थात्- हे पुत्र! तुमने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया है, फिर भी व्याकरण शास्त्र अवश्य पढ़ो, जिससे तुम्हें शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके। यही है व्याकरण का उद्देश्य।