कामसूत्र के अनुसार छन्दोज्ञान कला की व्याख्या इस प्रकार है–
पिंगलादिप्रणीतस्य छन्दसो ज्ञानम् ।काव्य रचना, पाठ और उसके रसास्वादन के लिये छंदज्ञान आवश्यक है। छंद अक्षरों की निश्चित संख्या के द्वारा वाणी को पदों में मर्यादित करते हैं। छंद में गति–यति, आरोह–अवरोह, ताल–लय और संगीत का समन्वय होता है। कोई भी पद्य रचना छंद के बिना संभव नहीं है। विषय, रस एवं भाव के अनुकूल छंद का प्रयोग, छंद के ज्ञान की विशिष्टता होती है। श्रीकृष्ण गति वाद्य और नृत्य में अति निपुण थे। स्वभावत: वे छंदोज्ञान कला में भी अति निपुण थे। उन्होंने स्वयं अर्जुन को गीता का उपदेश करते हुये कहा था कि–
बृहत्साम तथा साम्नी गायत्री छन्दसामहम् ।श्रीकृष्ण कहते हैं कि गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम तथा छन्दों में गायत्री छंद हूँ।
श्रीकृष्ण के कथन का तात्पर्य यदि विचारपूर्वक समझा जाये तो यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि वे छंदोज्ञान कला के प्रयोग में पूर्ण समर्थ तथा निपुण थे।

