न्याय विद्या अर्थात् 'आन्वीक्षिकी'। इस विद्या की चर्चा ऋग्वेद में है, यथा-
'कासी प्रभा प्रतिभा किं निदानम्।'न्याय शास्त्र में 'प्रभा' शब्द यहीं से आया है, इस प्रकार न्याय शास्त्र के बीज ऋग्वेद में निहित हैं।
ब्राह्मण ग्रंथ महाभारत काल के हैं। इनकी मौलिक सामग्री ऋषि-मुनियों द्वारा रची हुई है, यह बात न्याय सूत्रों के भाष्यकार महामुनि वात्स्यायन मानते हैं-
प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेति हास पुराणस्य प्रामाण्यमभ्यऽ नुज्ञायते।
ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एतर्ददितिहास पुराणमस्य वदन.......
य एव मन्त्र ब्राह्मणस्य द्रष्टार: प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहास पुराणस्य धर्मशास्त्र चेति।वे आगे पुन: न्याय सूत्र (2/2/67) की व्याख्या करते हुए बताते हैं- कि ऋषियों के सम-सामायिक अर्थात् मंत्र-दृष्टा ऋषियों के काल में धर्म-शास्त्र, न्याय, इतिहास, पुराण और आयुर्वेद के ग्रंथ विद्यमान थे। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण कहता है कि इस समय इतिहास, पुराण, उपनिषद, सूत्र ग्रंथ और व्याख्या ग्रंथ प्रस्तुत हैं। - (शत.14/6/10/6)
छान्दोग्य उपनिषद (7/2) के अनुसार उस इतिहास, पुराण, ब्राह्म विद्या, भूत विद्या, छत्र विद्या, नक्षत्र विद्या, सर्प देवविद्या का अध्ययन होता था।
मुण्डकोपनिषद (1/5) में आया है कि 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्त, छन्दों ज्योतिषं इति' अर्थात् शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द-शास्त्र और ज्योतिष पढ़े और पढ़ाये जाते थे।
इस प्रकार निष्कर्षत: कहा जा सकता हैं कि वेद के यह छ: अंग अति प्राचीन काल में मंत्र-द्रष्टा ऋषियों के समय ही पढ़े और पढ़ाये जाने लगे थे। इस प्रकार यह छ: अंग उतने ही प्राचीन हैं, जितने ब्राह्मण ग्रंथ तथा प्रमुख उपनिषद माने जाते हैं। ये वैदिक साहित्य के प्रमुख अंग हैं।

