कामसूत्र के अनुसार निमित्त ज्ञान कला की व्याख्या इस प्रकार है–
शुभाशुभादेशपरिज्ञानफलम् ।निमित्त ज्ञान का तात्पर्य है– शुभ और अशुभ शकुन का फल जानना। निमित्त ज्ञान अथवा शुभाशुभ शकुन विचार में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक जनसाधारण का ही नहीं, अपितु उच्चवर्गीय, शिक्षित, सभ्य और शिष्ट समाज का भी पूर्ण विश्वास था, जो सैंकड़ों वर्षों बाद आज भी लोगों के मन में बसता है।
ब्रह्मवैवर्त्त पुराण के अन्तर्गत श्रीकृष्ण जन्मखण्ड के उत्तरार्द्ध भाग में श्रीकृष्ण की यात्रा के संबंध में व्यास जी ने जो लिखा है, उससे स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण को 'निमित्त ज्ञान' के विषय में पूर्णान्त ज्ञान था। वे जब मथुरा पुरी जाने लगे थे तो उसके पूर्व उन्होंने जो कार्य किया, वह निमित्त ज्ञान के विषय का ही संसूचक है–
ददर्श वर्त्मन्येवं च मङ्गलार्हं शुभप्रदम् ।
वाञ्छाफलप्रदं रम्यं पुरो मङ्गलसूचकम् ॥22 ॥ .....शुक्लोत्पलं पद्मवनं शङ्खचिल्लं च कीरकम् ।
मार्जारं पर्वतं मेघं मयूरं शुक सारसम् ॥श्रीकृष्ण ने देखा कि बाम भाग में सियार और सियारनी हैं। पूर्ण कलश, नेवला, पति और पुत्र सहित पतिव्रता स्त्री, श्वेत पुष्प, माला, खंजन पक्षी हैं। दाहिनी ओर जलती हुई आग है। ब्राह्मण, बैल, हाथी, बछड़े सहित गाय, सफेद घोड़ा, हंस, वेश्या, पताका, मणि, स्वर्ण, चाँदी, मोती, माणिक, मद्य, मांस, चन्दन, महुए की शराब, घृत, काला हिरण, लवा, दर्पण विमान, प्रतिभा, श्वेतकमल, शंख, चील पक्षी, बिल्ली, पर्वत, मेघ, मोर और तोता तथा सारस पक्षी देखे। यह देखकर श्रीकृष्ण को अपार हर्ष हुआ था।
अत: स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण निमित ज्ञान में अति निपुण थे।

