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यन्त्रमातृका

मशीनों का संचालन

यन्त्र की परिभाषा राजा भोज ने अपने ग्रन्थ 'समरांगण–सूत्र' में इस प्रकार की है कि स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाले महाभूतों अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्त्वों को मानवीय कौशल से जिस वस्तु का नियंत्रित उपयोग किया जाता है, उसे 'यन्त्र' कहते हैं–

सजीवानां निर्जीवानां यन्त्रणां यानोदकसंग्रामार्थं घटनाशास्त्रम् ।
यदृच्छया प्रवृत्तानि भूतानि स्वेन वर्त्मना । नियम्यास्मिन्नयति यत् तद् यन्त्रमिति कीर्तितम् ॥
– ( समरांगण सूत्र, 42.3 )

आग्नेयास्त्र में 'अग्नि' बीज है और वारि यन्त्रों में 'जल' बीज। यन्त्रों में यथावत् बीज संयोग, सुश्लिष्टता, लक्षणता, अलक्ष्यता आदि गुणों का होना अनिवार्य है।

श्रीमद्भागवत पुराण में दशम स्कन्ध के उत्तरार्थ में वाणासुर के साथ जब श्रीकृष्ण ने युद्ध किया था, उस समय श्रीकृष्ण ने ब्रह्मास्त्र, वायव्यास्त्र, आग्नेयास्त्र, पार्जन्यास्त्र और पाशुपत अस्त्रों का प्रयोग किया था और साथ ही जृम्भणास्त्र का भी उन्होंने प्रयोग किया था। इस बात को श्री व्यास जी ने बताया है–

ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतम् । आग्नेयस्य च पार्जन्यं नैजं पाशुपतस्य च ॥ मोहयित्वा तु गिरिशं जृम्भणास्त्रेण जृम्भितम् । वाणस्य पृतनां शौरिर्जघानासिगदेषुभिः ॥14 ॥
– ( श्रीमद्भागवत पुराण, दश./63/13–14 )

इस प्रकार श्रीकृष्ण यन्त्र चालित अस्त्र विद्या में अति निपुण थे। फलत: यह कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण यन्त्रमातृका कला में भी निपुण थे।