स्मरण शक्ति बढ़ाने की कला। धारणा शक्ति बुद्धि का गुण है।
श्रुतस्य ग्रन्थस्य धारणार्थं शास्त्रम् ।सभी विद्याओं का अर्जन, धारण करने की क्षमता पर निर्भर करता है। इस कला के विकास के लिये अभ्यास आवश्यक है। अर्थात् ज्ञान का सतत् चिंतन मनन एवं ग्रहीत का पुन:–पुन: श्रवण अभ्यास कहलाता है। धारणा के विकास के लिये निग्रह अनिवार्य है। श्रीकृष्ण के जीवन में उनकी धारण मात्रिका कला के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। प्रथम उदाहरण तो जब वे श्री गुरु के आश्रम में पहुँचे तो–
तयोर्द्विजवरस्तुष्ट: शुद्ध भावानुवृत्तिभि: ।
प्रोवाच वेदानखिलान्साङ्गोपनिषदो गुरु: ॥33 ॥श्रेष्ठ द्विज गुरु ने प्रसन्न होकर उन दोनों को समस्त षडंग सहित वेद और उपनिषदों का उपदेश दिया।
सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपथांस्तथा ।
तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्विधाम् ॥34 ॥रहस्य सहित धनुर्वेद, धर्मशास्त्र, न्यायशास्त्र, नीतिशास्त्र, छहों प्रकार की राजनीति का ज्ञान दिया।
सर्वं नरवर श्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ ।
सकृन्निगदमात्रेण तौ संजगृहतुर्नृप ॥35 ॥समस्त विद्या का आरम्भ करने वाले श्रीकृष्ण बलराम ने वे समस्त विद्याएँ एक बार कहने मात्र से ग्रहण कर लीं।
अहोरात्रैश्चतुः षष्ट्या संयत्तौ तावती: कलाः ॥36 ॥सब विद्या और कला उन्होंने चौंसठ दिनों में सीख लीं। दूसरा उदाहरण है– श्रीमद्भागवत में ही एकादश स्कन्ध के अंतर्गत श्रीकृष्ण और उद्धव संवाद के समय उद्धव के पूछने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सांख्य का उपदेश दिया। वह उपदेश सांख्य दर्शन एवं उपनिषद् के उस ज्ञान पर आधारित है, जो उन्होंने उज्जैयनी में अपने गुरु से सीखा था। तीसरा स्थान है। महाभारत में जो अर्जुन को श्रीकृष्ण ने योग बताया है, वह पातंजलि योग दर्शन नहीं है, वह शांभव योग दर्शन है, जो उन्होंने शैव गुरु श्री दुर्वासा और श्री उपमन्यु से सीखा था। –( क्.पु.)

